लैंको की बढ़ी हुई टैरिफ को एपीलेट ट्रिब्यूनल फार इलेक्ट्रिसिटी द्वारा खारिज किए जाने के बाद लैंकों में आर्थिक संकट की स्थिति बन गई है। बढ़ी दर पर हुए भुगतान को समायोजित करने के लिए उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन से करीब तीन माह से बिजली का कोई भुगतान नहीं मिल रहा है। इससे संकट गहराता जा रहा है। 20 से 25 हजार मीट्रिक टन रोज कोयले की खरीद को घटाकर दो से तीन हजार मीट्रिक टन कर दिया गया है। फिलहाल कोयले के स्टाक से काम चलाया जा रहा है। जल्द हालात नहीं संभले तो विद्युत उत्पादन शून्य हो सकता है।
प्रदेश सरकार से करार के तहत लैंको पूरी बिजली राज्य सरकार को देता है। 2015 से पहले लैंको परियोजना की टैरिफ दर प्रति यूनिट 1.90 रुपये थी। जून 2015 में विद्युत नियामक आयोग की तरफ से गठित कमेटी ने टैरिफ दरों में 22 पैसे बढ़ोतरी की संस्तुति की। इसके बाद उसे लागू कर दिया गया। दिसंबर 2016 में बढ़े टैरिफ को ट्रिब्यूनल ने खारिज कर दिया। इसके बाद जनवरी में यूपी पावर कारपोरेशन ने नई टैरिफ दर जारी करते हुए बढ़ी हुई दर पर हुए भुगतान को समायोजित होने तक के लिए लैंको के भुगतान पर रोक लगा दी।
इसके चलते मार्च आते-आते लैंको में आर्थिक संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई। कंपनी ने आंतरिक खर्चों पर कैंची चलानी शुरू कर दी है। बाहर की पार्टियों के जो भी भुगतान हैं, उसे हालात सुधरने तक रोक दिया गया है। कोयला खरीदने के लिए अग्रिम भुगतान नहीं हो पा रहा है। इससे एनसीएल से रोजाना 11 से 12 हजार मीट्रिक टन मिलने वाले कोयले की मात्रा दो से तीन हजार मीट्रिक टन पर आ गई है। बाहर से कोयले की खरीद ठप है। स्टाक में भी कोयला महज एक सप्ताह का बचा है। ऐसे में जल्द हालात नहीं सुधरे तो परियोजना में उत्पादन शून्य होने की स्थिति बन सकती है। उधर, लैंको के एचआर हेड एसके द्विवेदी ने कहा कि भुगतान न मिलने से आर्थिक संकट जरूर है, पर जल्द हालात सुधर जाएंगे।