दशहरा पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन देश के अधिकांश हिस्सों में रावण का पुतला जलाकर लोग धूमधाम से त्योहार मनाते हैं, वहीं जिले का एक तबका रावण दहन से परहेज करता है। आदिवासी वर्ग रावण को अपना पूर्वज मानते हुए रीति रिवाजों से पूजा करता है।
छत्तीसगढ़ और झारखंड की सीमा से सटे कई गांवों में यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। दशहरे पर रावण की पूजा की जाती है। आदिवासियों के अनुसार रावण उनके पूर्वज हैं। जंगलों में रहने वाले राक्षस कुल के लोग ही उनके पूर्वज हैं। उनके पूर्वज भी वन में रहकर ही आज यहां तक पहुंचे हैं।
इस संबंध में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के स्टूडेंट यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष जय मंगल सिंह का कहना है कि आदिवासी जंगलों में रहा करते थे। रावण के कुल खानदान के लोग जंगलों में ही राक्षस के रूप में रहते थे। इस प्रकार वह हम लोगों के पूर्वज हैं। कई प्रदेशों में रावण की पूजा होती रही है।
सोनभद्र के दक्षिणांचल के लोग जैसे-जैसे यह जान रहे हैं, उस अनुसार रावण की पूजा कर रहे हैं। दशहरा के दिन रासपहरी, गुलालझरिया, रावण चौक मगरमाड़, नवाटोला, बघाडू, नधिरा, तुमिया, मालोघाट आदि जगहों पर रावण की पूजा होती है।
मारवाड़ी समाज में होगी रावण की पूजा
दशहरे पर मारवाड़ी समाज के लोग भी रावण की पूजा करेंगे। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा का निर्वहन करते हुए वह रावण की अच्छाइयों को अपनाने की प्रार्थना करेंगे। इस दिन बहनें अपने भाई का तिलक भी करेंगी।
अग्रवाल समाज के अध्यक्ष पवन जैन ने बताया कि रावण विद्वान थे। धन, बल, बुद्धि, विवेक सहित राजनीतिक ज्ञान विज्ञान में वह सर्वश्रेष्ठ थे। अहंकार में भगवान श्रीराम से शत्रुता के कारण रावण ने और उनके परिवार ने मोक्ष पाया। रावण में कई बुराइयां थी तो कुछ अच्छाइयां भी थी। इन्हीं अच्छाइयों को अपनाने के उद्देश्य से रावण की पूजा की जाती है।
परंपरा के अनुसार गाय के गोबर से रावण के दस सिर बनाया जाता है। दसों सिर पर जरई रखकर पूजा की जाती है। मारवाड़ी युवा मंच के पूर्व अध्यक्ष पंकज कानोडिया ने बताया कि पीढ़ियों से यह परंपरा चली आ रही है, जिसका निर्वहन किया जा रहा है। मारवाड़ी समाज के राहुल बताते हैं जिला मुख्यालय पर करीब सौ से अधिक मारवाड़ी परिवार दशहरे के दिन अपने घरों में रावण की पूजा करते हैं।