सिंधी समाज ने की मांग।
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सिंधी समाज से जुड़े पूर्व पार्षद शंकर विश्नानी ने बताया कि इस शिवलिंग से भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौर की स्मृतियां जुड़ी हैं। कहा कि बंटवारे के समय उनके पूर्वज सीताराम मोटवानी ने इस शिवलिंग को पाकिस्तान के सिंध प्रांत से भारत लेकर आए थे। उस समय सिंधी समाज के लोगों की स्थिति बेहद कठिन थी। वे अपनी जमीन, व्यापार और दूसरी संपत्तियां छोड़कर खाली हाथ भारत आए थे।
मुश्किल हालात में पूर्वजों के सामने यह सवाल था कि शिवलिंग की पूजा और सेवा किस तरह जारी रखी जाए। एक समय शिवलिंग को गंगा में प्रवाहित करने का विचार भी आया। इसी दौरान काशी के विद्वानों ने सिंधी समाज से आग्रह किया कि शिवलिंग को गंगा किनारे मंदिर में स्थापित कर दिया जाए। स्थानीय लोगों के आग्रह पर सिंधी समाज ने शिवलिंग उन्हें सौंप दिया।
इसके बाद काशीवासियों ने गंगा किनारे निर्धारित स्थान पर शिवलिंग की स्थापना कराई। तभी से यहां विधि-विधान के साथ शिवलिंग की पूजा-अर्चना लगातार होती आ रही है और यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा हुआ है। पिछले दिनों यहां पर पाकिस्तानेश्वर महादेव के नाम का फ्लेक्स लगाया गया था। जिसे हटवाने और कार्रवाई के लिए सिंधी समाज के लोगों ने नगर निगम में अपर नगर आयुक्त विनोद कुमार गुप्ता को ज्ञापन दिया था।
आठ अक्तूबर को होने वाली कार्यकारिणी बैठक में वे इस मंदिर का नाम सिंधु गंगेश्वर महादेव करने के संबंध में प्रस्ताव देंगे। नगर निगम अधिनियम के अनुसार कार्यकारिणी की बैठक से 48 घंटे पूर्व प्रस्ताव देना अनिवार्य है। चूंकि दो अक्तूबर को नगर निगम बंद है इस नाते कल प्रस्ताव देंगे। - राजकपूर चौधरी अजय, सपा कार्यकारिणी सदस्य, नगर निगम