सोनभद्र। नए शिक्षण सत्र की शुरुआत हो चुकी है। ज्यादातर स्कूल भी खुल चुके हैं। समय से स्कूल आने-जाने के लिए बच्चे जिन वाहनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, वे सुरक्षित नहीं है। कहीं ई-रिक्शा तो कहीं टेंपो में बैठाकर बच्चों को ले आया और ले जाया जा रहा है। इन छोटे वाहनों में क्षमता से अधिक बच्चे बैठाए जा रहे हैं। न वाहनों में जाली है और न ही अन्य कोई सुरक्षा उपाय। विभाग ऐसे वाहनों की जांच के लिए शायद हादसे का इंतजार कर रहा है।
जिले में मान्यता प्राप्त विद्यालयों के 380 वाहन पंजीकृत हैं। इनमें ज्यादातर छोटी-बड़ी बसें और वैन हैं। इनके अलावा भी सैकड़ों वाहन ऐसे हैं, जिनका संचालन बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने के लिए हो रहा है। कहीं ई-रिक्शा और टेंपो में बच्चे भरे जा रहे तो कहीं पिकअप, जीप और छोटी कार को ही स्कूल वाहन का रूप दे दिया गया है। ऐसे ज्यादातर वाहनों में सुरक्षा के मानक भी पूरे नहीं है। वाहनों में न जाली लगी है, न फर्स्ट एड किट और न ही चालक के अलावा कोई सहयोगी। इनमें बच्चों को ठूंस कर बैठाया जा रहा है। उनके बैग, बोतल भी वाहन से बाहर लटकते रहते हैं। ये वाहन भी कभी स्कूल में बच्चे ढोते नजर आते हैं तो कभी सड़कों पर सवारी लेकर दौड़ते हैं। रिकॉर्ड में इनका जिक्र न होने से विभाग भी इनसे बेखबर है। कोई दुर्घटना होती है तो स्कूल प्रबंधन इन्हें अपने विद्यालय से संबद्ध न होने का हवाला देकर पल्ला झाड़ लेते हैं। अमूमन सभी स्कूलों में ऐसे वाहनों का संचालन हो रहा है, लेकिन उन विद्यालयों में इनकी संख्या अधिक है, जहां स्कूल की तरफ से किसी तरह के वाहन की सुविधा नहीं दी जाती। ऐसे में अभिभावक नियमित रूप से बच्चों को समय से स्कूल आने-जाने के लिए अपने रिस्क पर इन वाहनों का सहारा लेने के लिए विवश होते हैं। नगर की सड़कों पर हर रोज मानक को दरकिनार कर ऐसे वाहन दौड़ते दिख रहे हैं, मगर जिम्मेदार इससे बेखबर हैं।
स्कूल वाहनों के लिए ये हैं मानक
0 स्कूल वाहन पीले रंग का होना चाहिए। वाहन के चारों ओर बीच में 150 मिमी चौड़ाई की हरे रंग की क्षैतिज पट्टी होनी चाहिए। उस पर स्कूल वाहन शब्द स्पष्ट रूप से अंकित होना चाहिए।
0 वाहन का पंजीकरण, प्रदूषण प्रमाण पत्र, फिटनेस प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज आवश्यक हैं।
0 बच्चों की सुरक्षा के लिए चालक का डीएल और पुलिस से सत्यापन अनिवार्य है।
0 वाहन में अग्निशमन यंत्र की व्यवस्था हो और फर्स्ट एड किट भी हो।
0 सुरक्षा के मद्देनजर जीपीएस, सीसीटीवी कैमरा और स्पीड कंट्रोल भी होना चाहिए।
0 वाहन पर चालक का नाम व मोबाइल नंबर, पुलिस हेल्पलाइन नंबर अंकित होना चाहिए।
0 खिड़कियों पर जाली लगी हो, जिससे बच्चे सिर बाहर न निकाल सकें। आपातकालीन निकास भी हो। 0 गेट पर लॉक लगा हो, जिससे बच्चे बाहर गिर न सकें।
हो चुके हैं हादसे
स्कूली बच्चों से भरे वाहनों के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनाएं अक्सर हो रही हैं। पिछले महीने ही कोन क्षेत्र के मिश्री गांव में एक निजी स्कूल की बस अनियंत्रित होकर पेड़ से टकरा गई थी। घटना के वक्त 15 से अधिक बच्चे बस में थे। उन्हें चोट भी आई थी। इससे पहले दुद्धी, चोपन, सलखन, रामगढ़ में भी पूर्व के वर्षों में दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। दो साल पहले मधुपुर में एक स्कूल वाहन की चपेट में आने से मासूम की जान चली गई थी।
-
वर्जन...
सभी स्कूल प्रबंधन को पत्र जारी कर वाहनों के फिटनेस, पंजीकरण व सुरक्षा से जुड़ी अन्य प्रकियाओं को पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। पंजीकृत ज्यादातर वाहनों ने फिटनेस कराया भी है। जिन स्कूलों में टेंपो या ई-रिक्शा से बच्चे आ-जा रहे हैं, वहां स्कूल प्रबंधन का दायित्व है कि वह वाहनों में सुरक्षा प्रबंध सुनिश्चित कराए। औचक निरीक्षण कर नियमाें का उल्लंघन करने वाले वाहनों पर कार्रवाई की जाएगी। -धनबीर यादव, एआरटीओ प्रशासन।