राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने वन (धारा चार) से जुड़ी जमीनों पर संचालित सभी बालू-पत्थर साइटों पर खनन कार्य रोकने का आदेश दिया है। फैसले में 18 जुुलाई 1994 के बाद कैमूर सर्वे एजेंसी और वन बंदोबस्त अधिकारी की ओर से धारा चार के प्रकाशन के बिना जमीन राज्य सरकार या भूमिधर को देने के निर्णय को गलत ठहराया है। इससे ओबरा वन प्रभाग एरिया के बिल्ली मारकुंडी और डाला बारी की छह गांवों में पत्थर की 30 से 40 और बालू की छह से दस खदानों पर निरस्तीकरण की तलवार लटक गई है।
वर्ष 1986 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जिले के आदिवासियों, वनवासियों को कब्जे के आधार पर मालिकाना हक दिलाने के लिए सर्वे एजेंसी का गठन हुआ था। इसी की आड़ में वर्ष 1994 के बाद खनन माफियाओं और भू-माफियाओं ने सर्वे एजेंसी के साथ मिलीभगत करके धारा-चार में विज्ञापित जमीनों को हथिया लिया। इसी दौरान बिल्ली-मारकुंडी, बरदिया, सिंदुरियां, कोटा, ससनई, बडग़वां, बरहमोरी, भगवा, महरपुर, अगोरी खास, बिजौरा आदि क्षेत्रों में धारा चार में विज्ञापित करीब आठ हेक्टेयर से अधिक जमीन राज्य सरकार और भूमिधर के कब्जे में दे दी गई। इसका खुलासा चार मई 2016 को एनजीटी के फैसले में हो चुका है।
इसी मामले में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) सरकार को डाला में जयप्रकाश एसोसिएट से 1083.231 हेक्टेयर भूमि वापस लेने का आदेश दे चुकी है। एनजीटी ने फैसले में कहा है कि 18 जुुलाई 1994 के बाद कैमूर सर्वे एजेंसी के एडीजे, वन बंदोबस्त अधिकारी (एफएसओ) ने वन भूमि धारा चार के संबंध में जो भी निर्णय लिया है, वह गलत है।
साथ ही उन जमीनों पर अगर खनन कार्य आदि हो रहे हैं तो तत्काल उसे निरस्त किया जाए। साथ ही यदि गैर वानिकी कार्य हो रहा है तो उसे रोका जाए। एनजीटी ने कड़े शब्दों में उस समय के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं। वन विभाग के पक्ष में एनजीटी का फैसला आने के बाद खान विभाग में हड़कंप मच गया है।
ओबरा वन प्रभाग के डीएफओ ने 14 जून को को डीएम को पत्र भेजकर बिल्ली मारकुंडी, बरदियां, सिंदुरियां, कोटा, ससनई, बडग़वां में संचालित खनन पट्टों के संबंध में कार्रवाई का अनुरोध किया है।