पारेषण और वितरण लाइनों की खस्ताहाली बिजली उत्पादन पर भारी पड़ रही है। हाल यह है कि अप्रैल से अब तक लगातार थर्मल बैकिंग (उत्पादन घटवाना) से हजार मिलियन यूनिट से अधिक विद्युत उत्पादन प्रभावित हुआ है। सिर्फ बिजली टैरिफ के हिसाब से ही उत्पादन निगम को अभी तक लगभग 50 करोड़ का झटका लग चुका है। थर्मल बैकिंग के चलते ट्यूब लीकेज में बढ़ोत्तरी और इसके चलते इकाइयों की ट्रिपिंग से होने वाला नुकसान है सो अलग।
बिजली परियोजनाओं में जो भी बिजली पैदा होती है, उसे पारेषण लाइन के जरिए विद्युत उत्पादन को दिया जाता है। थर्मल बैकिंग बंद कराने और एनटीपीसी की भांति राज्य उत्पादन निगम की भी बिजली मांग से सरप्लस होने पर खुले बाजार में बेचने की व्यवस्था को लेकर कई बार आवाज उठाई जा चुकी है। इस एवज में प्रति यूनिट के हिसाब से पावर कारपोरेशन, राज्य उत्पादन निगम को भुगतान करता है। जब पारेषण या वितरण लाइन में खराबी आती है तो लखनऊ स्थित सिस्टम कंट्रोल में बिजली की मांग कम दिखने लगती है। इसके बाद बिजली घरों में थर्मल बैकिंग शुरू दी जाती है। सबसे महंगी बिजली देने वाली परियोजना में सबसे पहले थर्मल बैकिंग कराए जाने का नियम है, लेकिन 2630 मेगावाट वाली अनपरा परियोजना, जहां की बिजली प्रदेश में सबसे सस्ती है।