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Sonebhadra News: जिले में स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल, मरीज बेहाल

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सोनभद्र। आदिवासी बहुल जिले की स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं। नए-नए सरकारी अस्पताल तो खुल रहे हैं, लेकिन उसका लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिल रहा। कहीं डॉक्टर नदारद हैं तो कहीं जरूरी संसाधन उपलब्ध नहीं है। सुदूर गांवों में स्थित अस्पतालों की कौन कहे, मुख्यालय और उससे सटे अस्पताल ही मरीजों को बेहतर सेवाएं दे पाने में अक्षम साबित हो रहे हैं। सरकार से प्रदत्त करोड़ों की मशीनें धूल फांक रही हैं। नया बना भवन खंडहर में तब्दील हो रहा है। कई विभागों में जरूरी डॉक्टर-कर्मचारी भी नहीं है। अस्पतालों में पहुंचने वाले ज्यादातर मरीज प्राथमिक उपचार के बाद रेफर किए जा रहे हैं। वाराणसी और प्रयागराज से लंबी दूरी के कारण वहां तक पहुंचने से पहले की कई बार मरीजों की जान चली जाती है। स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से अति पिछड़े जिले में उप मुख्यमंत्री बृजेश पाठक के दौरे से लोगों में उम्मीद जगी है। लोगों का मानना है कि बदहाल सेवाओं की हकीकत पर उप मुख्यमंत्री की नजर पड़ जाए तो कई समस्याएं दूर हो सकती हैं। जिला अस्पताल और पीपीपी मॉडल पर स्थापित सौ शैया युक्त मातृ शिशु विंग बिना वेंटिलेटर संचालित हो रहे हैं। कोविड अस्पताल में 22 वेंटिलेटर, सीएचसी मधुपुर, शाहगंज, म्योरपुर में एक-एक, विभागीय स्टोर में दो वेंटिलेटर पड़े हुए हैं। लंबे समय से इनका कोई उपयोग नहीं हुआ है। सरकारी अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड की सुविधा नहीं मिल पा रही। सीएचसी नगवां, सीएचसी चोपन, सीएचसी घोरावल, सीएचसी म्योरपुर और डिबुलगंज संयुक्त अस्पताल में करीब साल भर पूर्व लाखों रुपये खर्च कर मंगाई गई नई अल्ट्रासाउंड मशीने स्टोर में पड़ी है। जिला अस्पताल में तैनात रेडियोलॉजिस्ट का स्थानांतरण होने के बाद यहां अल्ट्रासाउंड की सुविधा नहीं मिल पा रही। कुछ माह पूर्व स्वास्थ्य मंत्री ने शव वाहनों का लाभ जरूरतमंदों को देने का निर्देश दिया था। जिले में इसका कोई असर नहीं दिख रहा। हाल यह है कि मृतकों के शवों को घर तक पहुंचाने के लिए शव वाहन नहीं मिल पा रहे है, जबकि जिला अस्पताल परिसर के आवासीय भवन के पास दो शव वाहन धूल फांक रहे हैं।
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