सोनभद्र। महाशिवरात्रि पर्व सुप्रसिद्ध शिवालयों में भक्तों पूजन-अर्चन करने के लिए तांता लगेगा। शिवद्वार (गुप्तकाशी) में विराजमान उमा-माहेश्वर बरैला में स्थित भोले शंकर, गौरीशंकर में भगवान शिव, पंचमुखी पहाड़ी पर स्थित पंचमुखी महादेव समेत अन्य मंदिरों में श्रद्धालु मत्था टेकेंगे। मंदिरों मेें उमडने वाली भीड़ को देखते हुए पुलिस प्रशासन द्वारा सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए हैं। मंदिरों के आसपास सादे पोशाक में महिला-पुरूष पुलिस कर्मी तैनात रहेंगे।
जिला मुख्यालय से 39 किलोमीटर दूर शिवद्वार में उमा-महेश्वर की प्रतिमा सन 1305 में मोती महतो नामक व्यक्ति को मिली थी। किंवदंतियों के अनुसार खेत में हल जोतते समय यह दिव्य प्रतिमा मोती महतो को प्राप्त हुई थी। उसने वहां पर मंदिर बनवाकर मूर्तियों को स्थापित कराया। शिवद्वार के बाबू जगतबहादुर सिंह की धर्मपत्नी बहुरिया अविनाश कुंवरि ने शिवद्वार मंदिर का निर्माण सन 1942 में अपने स्व. पति की पुण्यस्मृति में कराया था। चुनार के कारीगरों द्वारा चुनार के पत्थर से तीन वर्षो में मंदिर का निर्माण हुआ। सन 1985 में परमहंस आश्रम अमेठी के श्री हरिचैतन्य ब्रह्मचारी की प्रेरणा से बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य जगद्गुरू स्वामी विष्णु देवानन्दजी सरस्वती महाराज के कर कमलों से मंदिर में श्रीशिवलिंग की वैदिक रीति से स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा की गई थी। मंदिर के मुख्य पुजारी सुरेश गिरि ने बताया कि भगवान शिवशंकर भक्तों की मुरादें पूरी कर देते हैं। राबट्र्सगंज नगर से दो किमी दूरी पर बरैला गांव में शक्तिपीठ मंदिर में संम्वत 700 से भगवान भोले शंकर की प्रतिमा स्थापित है। पूर्व में खपड़ैल की मंदिर में भगवान की प्रतिमा स्थापित थी। यहां पूजन-अर्चन करने वाले सभी भक्तों की मिन्नतें पूरी हो जाती है। 1959 में श्यामा झुनझुनवाला और भोला सेठ ने मंदिर का निर्माण कराया। वर्ष 2013 में नंदलाल केशरी ने मंदिर का भव्य जीर्णोद्वार कराया। यहां बसंत पंचमी, शिवरात्रि पर्व पर मेला लगता है। इसके अलावा मंदिर परिसर में समय-समय पर पूजन-अर्चन, वैवाहिक कार्यक्रम होता रहता है। श्रावण मास में श्रद्धालुओं द्वारा झांकी सजाई जाती है। पुजारी देवनाथ ने कहा कि जो भक्त सच्चे मन से पूजन-अचर्न करते है उनकी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है। रौप गांव में स्थित पंचमुखी पहाड़ी पर मारकंडेय ऋषि की तपोस्थली थी। यहां पर स्थित पंचमुखी महादेव मंदिर में पूजन-अर्चन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। यह मंदिर लोगों के लिए आस्था केंद्र बन चुका है। जिले के अलावा अन्य जनपदों से भी पहुंच रहे हैं। बसंत पंचमी, शिवरात्रि पर्व पर मेला लगा रहता है। श्रावण मास में कांवरिए जलाभिषेक भी करते हैं। मंदिर के पुजारी लक्ष्मण दूबे कहते है किे करीब 15 हजार वर्ष पूर्व पंचमुखी महादेव की मंदिर है। पंचमुखी महादेव भक्तों के हर मनोकामना को पूर्ण करते हुए मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर का जीर्णोद्वार कराया जा रहा है। रेणुकूट: दक्षिणांचल का यह इलाका न केवल औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिए जाना जाता है, बल्कि देवालय सुंदर कलाकृति एवं विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं के लिए देश भर में प्रसिद्ध हैं। नगर में एक छोर पर विशालकाय रेणुकेश्वर महादेव मंदिर शोभायमान हो रहा है वहीं दूसरे छोर पर पारा एवं अन्य द्रव्यीय पदार्थो के संयोग से निर्मित विशालकाय शिवलिंग आध्यात्मिक विशिष्टता सहेजे मुर्धवा ग्रामसभा में स्थित है। यह मंदिर समन्वय परिवार आश्रम में स्थित है। आश्रम की स्थापना हरिद्वार स्थित भारत माता मंदिर ट्रस्ट के संस्थापक स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि द्वारा घने जंगलों के बीच सन 1982 में की गई। उज्जैन के महाकालेश्वर शिवलिंग के प्रतिरूप को स्थापित करने के उद्देश्य से सन 2007 में नर्मदा नदी में पाए जाने वाले संगमरमर पत्थरों से बने 532 किलोग्राम के जलहरी पर उज्जैन में निर्मित 501 किलोग्राम विशाल शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की गई। समन्वय परिवार आश्रम के सचिव राकेश त्रिपाठी बताते हैं कि पारद के द्रव्य रूप को रासायनिक, आयुर्वेदिक एवं धातु के संयोग से ठोस आकृति का बनाया गया है।