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धर्म की रक्षा के लिए महापुरुषों का होता है अवतार

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सोनभद्र। राबर्ट्सगंज के इमरती कालोनी में चल रहे श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञानयज्ञ के दूसरे दिन शनिवार को काशी धर्म पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ महाराज ने कहा कि धर्म की रक्षा के लिए महापुरुषों का अवतार होता है। कोई भी नर-नारी जब तपस्या करेगा तो वहां पर योग्य संतान पैदा होगी। यह प्राचीन युग का सत्य नहीं है, हर युगों का सत्य है।
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कहा कि माता-पिता संयम रखेंगे, तपस्या करेंगे, ईश्वर पर निष्ठा होगी, कर्तव्य परायणता होगी, धर्म-गुरु-शास्त्र में श्रद्धा होगी तो उसकी संतान दैवी संपदा से संपन्न जरूर पैदा होगी। आज के परिवेश में दैवी संतानों की अधिक आवश्यकता है। शंकराचार्य ने उद्धव एवं धर्मराज विदूर संवाद का वर्णन करते हुए बताया कि कर्मयोगी के जीवन में मानसिक अनुशासन का बहुत अधिक महत्व है। मन तथा शरीर का पारस्परिक संबंध है। मन के चिंतन का शरीर पर तथा शरीर के स्वास्थ्य का मन पर प्रभाव पड़ता है। मन के सुखी अथवा दु:खी होने पर शरीर स्वस्थ अथवा शिथिल हो जाता है तथा शरीर के स्वस्थ अथवा अस्वस्थ होने पर मन प्रसन्न अथवा उदास हो जाता है, किन्तु वास्तव में मन शरीर पर शासन करता है तथा शरीर पर मन का ही प्रभुत्व होता है। भावुक मनुष्य दृढ़ता से परिस्थिति का सामना नहीं कर सकता, बल्कि शोक, क्रोध अथवा निराशा से ग्रसित होकर दयनीय अवस्था को प्राप्त हो जाता है। मोह के कारण ही मनुष्य वस्तुओं की आवश्यकता से अधिक परिग्रह की कामना से ग्रस्त होता है। कर्मयोगी भोग से त्याग की ओर बढ़ता रहता है तथा त्यागपूर्वक भोग करता है। त्याग से ही शांति प्राप्त होती है। त्याग वृत्ति मनुष्य को ऊंचा उठा देती है। अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर जनमानस के हित को दृष्टि में रखकर कर्म करना, यज्ञ भावना से कर्म करना है। कार्यक्रम के आयोजक शिव प्रसाद पांडेय, पारस नाथ पांडेय, ओमप्रकाश पांडेय, राममणि सारस्वत, नागेंद्र दूबे, आरएन तिवारी, लालता पाठक, विंध्याचल मिश्र, पवन यादव, रामविलास मिश्रा आदि मौजूद रहे।
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