सोनभद्र। नोटबंदी का एक साल आठ नवंबर को पूरा हो रहा है। नोटबंदी के बाद डिजिटल भुगतान पर जोर दिया गया। एक साल पहले ज्यादातर लोग डिजिटल के बारे में जानते तक नहीं थे। लोग डिजिटल पेमेंट को लेकर काफी हद तक जागरूक हुए हैं। लेकिन यह जागरूकता नगरीय क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गई। शैक्षणिक रूप से पिछड़ा होने के नाते अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल भुगतान का कोई खास प्रभाव नहीं है। हालांकि लीड बैंक की ओर से वित्तीय साक्षरता और डिजिटल जागरूकता का आयोजन समय-समय पर किया जा रहा हैै।
नकली नोटों का प्रचलन बंद करने और डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2016 में आठ नवंबर को नोटबंदी की थी। इसके बाद वित्तीय लेनदेन को लेकर जैसे भूचाल सा आ गया था। पांच सौ औैर एक हजार रुपये की नोट प्रचलन में बंद करने के प्रधानमंत्री के फरमान के बाद इन नोटों को बैंकों में जमा करने वालों की भीड़ सड़क पर आ गई थी। इसके बाद सरकार ने डिजिटल इंडिया के सपने को साकार करने के लिए डिजिटल भुगतान की प्रक्रिया पर जोर दिया था। इसके लिए लोगों को जागरूक किया गया। बैंकों से दुकानदारों को पीओएस मशीनें दी गई थीं, ताकि नकदी लेनदेन पर रोक लगे। लेकिन सारी की सारी कवायदें नगरीय क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गईं। ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क की समस्या औैर शैक्षिक पिछड़ेपन के नाते डिजिटल इंडिया का सपना फिलहाल अधूरा सा है। लीड बैंक मैनेजर एसडी संतोषी कहते हैं कि अब एटीएम, नेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग से खरीदारी, पैंसों के ट्रांसफर का प्रचलन बढ़ा है। बड़े दुकानदार पीओएस मशीनों से लेनदेन कर रहे हैं, लेकिन छोटे दुकानदार अभी इसे मैनेज नहीं कर पा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र शिक्षा के मामले में पिछड़ा है, इसलिए तमाम ग्रामीण इलाकों में डिजिटल भुगतान नहीं हो पा रहा है।