अनपरा परियोजना की स्थापना के समय हुए विस्थापन से प्रभावित 35 सौ परिवारों को पुनर्वास लाभ मिलेगा। यह बात खुद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका के परिप्रेक्ष्य में दाखिल शपथपत्र में स्वीकार की है। इसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिका निस्तारित कर दी है। जिन पात्रों को पुनर्वास नीति के अनुरूप लाभ नहीं मिलता है, वह हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सकते हैं।
सहयोग सोसाइटी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर विस्थापितों को राष्ट्रीय पुनर्वास नीति 2003 के क्रम में पुनर्वास लाभ दिलाने की मांग की गई थी। इस पर दो मार्च 2012 को राज्य सरकार को प्रभावित परिवारों को लाभ देने का आदेश दिया गया था। इसके क्रम में लाभ देने की पहल भी शुरू हुई लेकिन याचिकाककर्ता सहयोग सोसाइटी के सचिव पंकज मिश्रा का आरोप था कि पुनर्वास नीति में जो प्रावधान हैं, उसका पूरी तरह से पालन नहीं किया जा रहा है। इसको लेकर उन्होंने कोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की।
जहां से मांगे गए जवाब के परिप्रेक्ष्य में गत 29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, न्यायमूर्ति एएम खनविलकर, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने सुनवाई की। अधिवक्ता एचएन नागमोहन दास के मुताबिक कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार और राज्य विद्युत उत्पादन निगम की ओर से आए जवाब में विस्थापन से प्रभावित 591 की जगह 35 सौ प्रभावित परिवारों को पुनर्वास एवं अन्य नियमानुसार लाभ देने की बात स्वीकार कर ली है। इसलिए जो भी पात्र हैं वह दावा कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं। अगर किसी पात्र को पुनर्वास नीति के अनुरूप लाभ नहीं मिलता है या वह असंतुष्ट है तो वह हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सकता है। बता दें कि गत दो अगस्त को विस्थापन से जुड़े एक अन्य मामले में हाईकोर्ट की तरफ से भी पुनर्वास लाभ देने के बाद ही, बेदखल करने का आदेश दिया गया है।