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मानव और पेड़-पौधों में बढ़ रही मरकरी की मात्रा

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सोनभद्र। भारत के पावर हब का दर्जा रखने वाले जिले में हवा-पानी-मिट्टी के साथ लोगों के शरीर और पेड़-पौधों में लगातार मरकरी की मात्रा बढ़ती जा रही है। अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए) नई दिल्ली की टीम द्वारा आईआईटी मुंबई की प्रयोगशालाओं में कराए गए परीक्षण में पौधों में मानक 92 गुना और मानव में (बाल)184 गुना तक मरकरी की मौजूदगी मिली है। इससे जहां लोगों की नींद उड़ गई है। वहीं सरकारी तंत्र भी अभी भी नियंत्रण की कवायद जारी होने का दावा करने में लगा हुआ है।
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सितंबर 2017 में एआईआईए दिल्ली और बीएचयू के विशेषज्ञों की टीम ने म्योरपुर, बभनी, चोपन और दुद्धी ब्लाक का दौरा कर प्रदूषण की स्थिति जानी थी। इस दौरान तीन सौ लोगों से मिलकर जहां उनसे, उनके स्वास्थ्य की स्थिति जानी गई थी। वहीं तीन सौ किमी एरिया में अलग-अलग हिस्से से दो पौधे, तीन मिट्टी, एक व्यक्ति के नाखून और तीन व्यक्तियों के बाल का नमूना लेकर आईआईटी मुंबई में प्रशिक्षण के लिए भेजा गया। सोमवार को सार्वजनिक हुई रिपोर्ट में एक पौधे में मरकरी की मात्रा 16.45 पीपीएम और दूसरे पौधे के नमूने में 92.27 पीपीएम मरकरी पाई गई है। मिट्टी में यह मात्रा 3.27 पीपीएम तक, नाखून में 8.27 पीपीएम पाई गई। सबसे खतरनाक स्थिति बाल के नमूनों की रही। इसमें पहले नमूने में 66.59, दूसरे नमूने में 16.19 और तीसरे नमूने 184.21 पीपीएम मरकरी के मौजूदगी की पुष्टि हुई। सोनभद्र और इससे सटे सिंगरौली में विद्युत उत्पादन के लिए रोजाना करीब तीन लाख टन कोयला जलाया जाता है, जिससे एक से सवा लाख टन राख उत्सर्जित होती है, जिसे पारा उत्सर्जन का बड़ा कारण माना जाता है। एआईआईए की रिपोर्ट में जाना के मिनिमाटा, ओतारिया, इराक और तमिलनाडु के कोडईकलनाल से भी खतरनाक स्थिति बताते हुए, रोकथाम के लिए अविलंब प्रभावी कदम उठाने की जरूरत जताई गई है।

बिजलीघरों से निकलने वाले जहर से बच्चे बीमार हो रहे हैं। घरों की छतें राख से ढंकी हैं। नदियों का पानी दो रंगों का हो चुका है। रविवार को म्योरपुर में 900 से ज्यादा ग्रामीण सांसद को समस्याओं से अवगत कराने के लिए जुटे थे लेकिन सांसद नहीं पहुंचे। लगता है जिम्मेदारी हमारी जिंदगी पर इसलिए ध्यान नहीं देना चाहते, क्योंकि हम दिल्ली या नोएडा में नहीं रहते। -रामेश्वर भाई, संयोजक प्रदूषण मुक्ति वाहिनी
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एनजीटी की कोर कमेटी के सिफारिशों को पूरी तरह लागू किया जाए और एक ऐसी स्वतंत्र निगरानी एजेंसी गठित की जाए जिसमें प्रभावित समुदायों के लोग शामिल हों और वह वायु प्रदूषण के स्तर और उनके नियमन पर नजर रखें। -डा. अनिल गौतम, अनुसंधान प्रमुख पीपुल साइंस इंस्टिट्यूट देहरादून

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वर्ष 2009 में ही सिंगरौली को चिंताजनक रूप से प्रदूषित क्षेत्र घोषित किया था, लेकिन अभी यहां के वायु प्रदूषण के स्तरों के बारे में कोई भी जानकारी न तो सार्वजनिक मंच पर मौजूद है और न ही आम नागरिकों को इससे बचाव के तरीकों के बारे में जानकारी है। क्षेत्र के 249 से ज्यादा गांव प्रदूषण से प्रभावित घोषित हैं। -अजयशेखर, अध्यक्ष बनवासी सेवा आश्रम

मंत्रालय ने वर्ष 2015 में कोयले से चलने वाले बिजलीघरों के प्रदूषणकारी तत्वों के उत्सर्जन पर नियंत्रण से संबंधित नए नियम-कायदे अधिसूचित किये थे, जिन्हें सात दिसंबर 2017 से लागू होना था। बावजूद इस दिशा में प्रगति दूर नियमों को लागू करने की मोहलत को वर्ष 2022स्त्रत्त् तक बढ़ाने की बात कही जाने लगी है। -ऐश्वर्या सुधीर, अनुसंधानकर्ता, बैंगलौर
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एनजीटी कोर कमेटी की जो भी अनुशंसाएं हैं, उन्हें लागू कराने का प्रयास किया जा रहा है। -एसबी फ्रेंकलीन, क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी
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