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महिलाओं-किशोरियों में स्वास्थ्य के प्रति ला रहीं चेतना

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सोनभद्र। आदिवासी अंचल में जो किशोरियां, महिलाएं संकोचवश अपना दुख-दर्द परिवार वालों तक से नहीं कह पाती थीं। वहीं किशोरियां-महिलाएं स्वास्थ्य से जुड़ी छोटी से छोटी समस्याओं को लेकर मुखर हो उठी हैं। यह संभव हुआ है डा. विभा के लगातार प्रयास और गांव-गांव स्वास्थ्य मित्र तैयार कर उन्हें उनके जरिए स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने से। सुरक्षित मातृत्व को लेकर वह लगातार कार्य जारी रखे हुए हैं। इसके लिए प्रति माह नौ तारीख को म्योरपुर सीएचसी पर लगने वाले कैंप में भी शामिल होकर उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं को खान-पान, एहतियात की जानकारी देने के साथ उपचार उपलब्ध कराती हैं।
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1965 में असुविधाओं से भरी जगह बनवासी सेवा आश्रम की स्थापना कर आदिवासियों का दुख-दर्द बांटने वाली डॉक्टर रागिनी प्रेम की बड़ी बेटी भी उन्हीं के नक्शे कदम पर चल पड़ेगी, यह किसी ने सोचा भी नहीं था। कक्षा आठ तक की पढ़ाई आश्रम के विद्यालय में पूरी करने के बाद विभा ने बिजनौर का रूख कर लिया। वहां बारहवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद महाराष्ट के सेवाग्राम-वर्धा स्थित महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज में एमबीबीएस में दाखिला ले लिया। 1998 में एमडी की पढ़ाई पूरी करने के बाद 2011 तक केरल, कानपुर आदि जगहों पर चिकित्सा सेवा की। बीच-बीच में जिले में आना बना रहा। आदिवासी अंचल की स्थितियों को देखते हुए लोगों खासकर किशोरियों-महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने की ठानी और 2012 से सोनभद्र को ही स्थाई ठिकाना बना लिया। करीब डेढ़ साल तक संविदा पर म्योरपुर सीएचसी में काम भी किया, इसके बाद आश्रम के आरोग्य सेवा केंद्र में सेवाएं देनी शुरू कर दी। पाया कि ग्रामीण अंचल की महिलाएं-किशोरियों अभी भी स्वास्थ्य के प्रति सजग नहीं है। जब स्थिति काफी बिगड़ जाती हैं, तब वह दिक्कत बताती हैं। इसके लिए उन्होंने उनके बीच जाने का निश्चय किया। इसके लिए गांव-गांव संपर्क कर 80 गांवों में स्वास्थ्य मित्र बनाए, इसमें 60 पूरी तरह सक्रिय बने हुए हैं। इससेे महिलाओं, किशेारियों के साथ पुरुषों को भी सही खान-पान, बीमारी होने पर समुचित इलाज की जानकारी तो दी ही जा रही है। गर्भवती महिलाओं को भी सही खुराक और बच्चे के पोषण के प्रति जागरूक किया जा रहा है। पान, गुटखा, तंबाकू, शराब का सेवन न करने, पर्यावरण को लेकर सजग रहने, संक्रामक रोगों से बचाव, झोलाछाप डॉक्टरों के पास न जाने की भी सलाह दी जा रही है। इस कार्य के लिए उन्हें 2018 में केंद्र सरकार से आईप्लेज्ड नाइन अवार्ड और फरवरी 2019 में प्रदेश सरकार से उत्कृष्ट सेवा पुरस्कार मिल चुका है। डेवी अवार्ड से भी उन्हें नवाजा गया है। डा. विभा कहती हैं कि शहरीकरण के आकर्षण और स्मार्ट दिखने की ललक ने गंवई जीवनशैली बिगाड़ कर रख दी है। इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। जरूरी है कि सस्ते के चक्कर में खुले में बिकने वाली खाद्य सामग्री न खरीदी-खाई जाए। बाजार में बिक रहे केमिकल युक्त सौंदर्य सामग्री से भी परहेज करने की जरूरत है।

इनसेट-
व्यापक जनजागरण और बेहतर लैब की जरूरत
सोनभद्र। डा. विभा कहती हैं कि प्रदूषण के साथ ही बिगड़ी जीवनशैली लोगों को तेजी से बीमार कर रही है। इससे कैंसर, लीवर, किडनी, चर्मरोग के साथ ही बाल पकने, झड़ने, बांझपन, गर्भपात की समस्या तेजी से बढ़ रही है। इस पर नियंत्रण के लिए व्यापक जनजागरण के साथ उच्च सुविधा युक्त लैब की जरूरत है। ताकि बीमारियों और उसके कारण की प्राथमिक स्तर पर सही जानकारी सामने आ सके।
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