सोनभद्र। देश के तीसरे सर्वाधिक प्रदूषित क्षेत्र को लेकर एनजीटी की सख्ती के बाद अब सरकारी तौर पर भी यहां को लेकर एयर इंडेक्स जारी होने लगा है। जनवरी 2018 में पहली बार जारी एयर इंडेक्स में हालात बेहद खराब दिखने के बाद सरकारी अमले के साथ ही आमजन की बेचैनी बढने लगी है। खासकर हवा में कार्बन की बढ़ती मात्रा ने विशेषज्ञों को भी चिंतित कर दिया है। इसको देखते हुए यहां वायु प्रदूषण के कारकों और खतरनाक रासायनिक तत्वों के उत्सर्जन को लेकर विस्तृत शोध की जरूरत जताई जाने लगी है।
2009 में ही केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सिंगरौली रीजन (सोनभद्र और सिंगरौली) के हालात काफी चिंताजनक बताए थे और नए उद्योगों के स्थापना पर भी रोक लगा दी थी। लेकिन बाद में प्रदूषण के नियंत्रण के लिए प्रभावी कदम उठाने का निर्देश देते हुए रोक हटा दी गई। बावजूद अधिकारी कागजी कवायद में ही जुटे रहे। इसको लेकर एनजीटी में याचिका दाखिल हुई तो 2014 और 2015 में एनजीटी की कोर कमेटी ने सोनभद्र का दौरा किया गया। अगस्त 2015 में विस्तृत रिपोर्ट भी एनजीटी को सौंप दी। एनजीटी ने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश दोनों सरकार को प्रभावी कदम उठाने का निर्देश दिया, लेकिन अधिकारी कागजी कवायद में जुटे रहे। इस बीच मुंबई की संस्था अर्बन साइंसेज ने सोनभद्र में 15 जगहों पर वायु गुणवत्ता मापन संयंत्र लगाए तो सामने आए आंकड़ों ने चौंका कर रख दिया। इस बीच गत छह दिसंबर को एनजीटी ने अपने यहां दाखिल याचिका का निस्तारण करते हुए अन्य निर्देशों के साथ ही सिंगरौली रीजन का नियमित एयर इंडेक्स जारी करने का भी निर्देश जारी कर दिया। इसी क्रम में रोजाना 24 घंटे के औसत को लेकर जारी होने वाले एयर इंडेक्स बुलेटिन में सिंगरौली रीजन को भी शामिल किया गया। 19 जनवरी को एयर इंडेक्स बुलेटिन के जरिए सामने आए आधिकारिक आंकड़े में स्पष्ट रूप से सिंगरौली एरिया का एयर इंडेक्स 389 बताते हुए हालात बेहद खराब बताई गई है। इसमें पीएम 2.5 की मात्रा सर्वाधिक बताई गई है।
इस बाबत पर्यावरण विशेषज्ञ ऐश्वर्या सुधीर ने कहा कि सोनभद्र में हालात बेहद खराब हैं। अब सिंगरौली एरिया को लेकर जारी एयर इंडेक्स बुलेटिन में भी इसे स्वीकार किया जाने लगा है। डब्ल्यूएचओ का मानक कहता है कि पीएम 2.5 की मात्रा 25 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर ही होना चाहिए, लेकिन इंडेक्स इसकी मात्रा 15 गुने से भी अधिक प्रदर्शित कर रहा है। उधर, पर्यावरण वैज्ञानिक प्रेमनारायण ने कहा कि हाल के दिनों में महानगरों में 2.5 की मात्रा घटी है लेकिन सोनभद्र में इसमें हैरतंगेज तरीके से वृद्धि हुई हैं। इसमें सर्वाधिक हिस्सेदारी कार्बन उत्सर्जन की है। बिजली इकाइयों के बंद रहने की दशा में भी इसमें गिरावट नहीं आ रहा है। इस कारण, इसको लेकर विस्तृत शोध की जरूरत है।