शक्तिनगर। ज्वालामुखी आवासीय परिसर में मंगलवार की रात साहित्यिक सामाजिक संस्था सोन संगम के तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी व काव्य संध्या में कवियों व साहित्यकारों की प्रस्तुतियों की खूब तारीफ हुई। कार्यक्रम भारत रत्न अटल जी व महामना मालवीय के जन्म दिन पर आयोजित किया गया था।
काव्य संध्या की शुरुआत में योगेंद्र मिश्र ने अटल जी की कविताओं आओ फिर से दीया जलाएं, गीत नया गाता हूं, पहचान आदि के वाचन से किया। कवि बलराम बेलवंशी ने यहां हिंदू ईद में गले मिलता है और मुसलमां उड़ाता है होली का गुलाल सुनाकर भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को रेखांकित किया। बहर बनारसी ने कभी भी जाते हैं घर पर पता नहीं चलता, कहां पे रहते हो मिस्टर पता नहीं चलता गजल सुनाकर श्रोताओं को गुदगुदाया। श्रवण कुमार ने सरल विरल सामान्य जो कह लें अपनी प्यारी धरा यही है गीत से श्रोताओं की खूब वाहवाही बटोरी। रमाकांत पांडेय ने काहे बोलेला बोलिया कठोर भइया जनगीत सुनाकर सामाजिक समरसता का संदेश देने का प्रयास किया। योगेंद्र मिश्र ने वक्त की कोख में पलती रहती है पर सबको आती नहीं है नजर रोशनी... गजल से अंधकार एवं प्रकाश के शाश्वत द्वंद्व को प्रस्तुत किया।
माहिर मिर्जापुरी ने शीशा है, पत्थर है और मोम भी नारी गीत सुनाकर नारी सशक्तीकरण का स्वर बुलंद किया। विजय दुबे ने भी सशक्त काव्य पाठ किया। काव्य संध्या में श्रोताओं ने एक से बढ़कर एक कविताओं का रसास्वादन किया। इस मौके पर प्रो. अनिल दुबे दिवाकर पटेल, समिधा मिश्र आदि गणमान्य उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता माहिर मिर्जापुरी ने की जबकि संचालन योगेंद्र मिश्र ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत दोनों महापुरुषों के चित्रों पर पुष्पार्पण से हुई। इससे पूर्व विचारगोष्ठी को संबोधित करते हुए एनटीपीसी शक्तिनगर के प्रबंधक राजभाषा आदेश पांडेय ने अटल जी एवं महामना मालवीय जी को संघर्ष, समन्वय एवं दूरदृष्टि का अद्भुत संगम बताया। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के प्रो. मानिक चंद पांडेय ने मालवीय जी के व्यक्तित्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उन्हें कुशल संगठक व प्रखर वक्ता के साथ भारतीय संस्कृति का सच्चा उपासक निरूपित किया। कार्यक्रम चंद्रशेखर जोशी के आभार प्रदर्शन के साथ संपन्न हुआ।