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प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों को संजोने की कवायद शुरू

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सोनभद्र। नृत्य, संगीत, कला, आखेट समेत तमाम पुरातन संस्कृतियों के गवाह गुफा चित्रों (रॉक पेंटिंग्स) को संजोने की कवायद शुरू हो गई है। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग ने इस शैल चित्रों का नये सिरे से अध्ययन करने और उनके संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने की योजना तैयार की है। शैल चित्र मध्य पाषाण काल से लौह युगीन संस्कृति तक का प्रतिनिधित्व करने वाले ये धरोहर प्राचीन परंपरा और आदिवासी संस्कृति की मिसाल के रूप में गुफाओं में मौजूद हैं।
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सोनभद्र में कई स्थानों पर गुफा चित्र (शैल चित्र) हैं। पंचमुखी पहाड़ी, मुक्खा फाल, राजपुर लखनिया, कौआखोह (खोड़वा पहाड़ी), रमना पहाड़ी मऊ कला, भलदरिया सुकृत के साथ ही विकास भवन के पास की पहाड़ी में गुफा चित्र मौजूद हैं, जो मध्य पाषाण काल की संस्कृतियों के गवाह हैं। गुफा चित्रों के जानकार बताते हैं कि जहां भी शैल चित्र पाए जाते हैं, वहां ज्यादातर चित्र जानवरों के शिकार (आखेट) से जुड़े हुए हैं। गैंडा, जिराफ, हिरन के शिकार के चित्र इनमें मौजूद हैं। इसके साथ ही कोहबर (शादी में घर में बनने वाले चित्र), पूजा पाठ, नृत्य, संगीत, कृषि उपादान से जुड़ी संस्कृतियों का चित्र भी इन गुफा चित्रों में मौजूद हैं। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग के क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी वाराणसी क्षेत्र डॉ. सुभाष चंद्र यादव कहते हैं कि सोनभद्र में दर्जनों पह़ाडियों पर गुफा चित्र पाए जाते हैं, जिनमें प्राचीन भारतीय संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। समूह में लोगों का आवागमन, जानवरों पर सवारी, जानवरों के शिकार, शादी-विवाह के मंडप, धार्मिक भावनाओं से जुड़ी संस्कृतियों के चित्र इन गुफा चित्रों में हैं, जो ऐतिहासिक धरोहर हैं। विभाग ने इन प्राचीन धरोहरों को संजोने और उसके संरक्षण के लिए लोगों को जागरूक करने की योजना तैयार की है। इसके तहत गुफा चित्रों का नए सिरे से अध्ययन किया जाएगा और उनकी वर्तमान स्थिति की जानकारी ली जाएगी।
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