ओबरा। जिले का काला पानी कहे जाने वाले रेणुका पार के सबसे दुर्गम क्षेत्रों में से एक और जिले की चंद बड़ी ग्राम पंचायतों में सुमार पनारी ग्राम पंचायत के लोग आजादी से अब तक आदिम युग सा जीवन जीने को मजबूर हैं। विकास की धूप न पहुंचने से पहाड़ों में बसे लोगों के जिंदगी का सफर बोझिल हो गया है। आलम यह है कि इतना पिछड़ा क्षेत्र और समस्याओं का अंबार होने के बावजूद टोले चंचलिया और बकिया में आज तक किसी भी जिला स्तरीय अधिकारी ने जाने की जहमत नहीं उठाई है। मूलभूत सुविधाओं की कमी और बेरोजगारी से बेवश लोगों तक विकास की रोशनी पहुंचेगी भी या नहीं यह एक यक्ष प्रश्न है। चोपन ब्लाक के पनारी ग्राम पंचायत की आबादी करीब 20 हजार है। करीब 30 किमी के दायरे में फैली इस ग्राम पंचायत में 63 टोले हैं। इसमें अमरसोता, कासपानी, जुर्रा, कर्री, भनबहवा, बहेराडाड़, कुमिया, मगरहवा, चंचलिया, बकिया आदि टोले शामिल हैं। सत्र 2005-06 में इसे अंबेडकर गांव का दर्जा भी मिला। लेकिन यहां के लोगों को अब तक बिजली, पानी और चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाएं मयसर नहीं हो सकी हैं। 40 परिषदीय विद्यालय इस क्षेत्र में मौजूद हैं। लेकिन शिक्षा का स्तर बेहद निम्न है। गांव में हर मौसम में चुआड़ का पानी ही लोगों का सहारा है। ग्रामीण रामकिशुन व रामलगन का कहना है कि कुछ टोलों में हैंडपंप लगे हैं, लेकिन पहाड़ों के बीच बसे चंलिया और बकिया के लोगों को पानी के लिए चार किमी की दूर तय करनी पड़ती है। अशोक तथा नन्हकू ने बताया कि यहां के लोगों की जिंदगी पहाड़ों तक ही सिमट कर रह गई है। बीमार होने पर इलाज के लिए 35 किमी दूर कोलडुमरी या 40 किमी दूर ओबरा जाना पड़ता है। सुनील
व शिव कुमार बताते हैं कि कुछ टोले ऐसे भी हैं जहां आजादी से अब तक यहां के ग्रामीणों को विकास नसीब नहीं हुआ। ग्राम प्रधान उदित नारायण खरवार कहते हैं कि ग्राम पंचायत के विकास का हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। हर टोले में सड़क उनकी प्राथमिकता है ताकि ग्रामीणों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सके।