डाला। सामान्यतया देवों के देव महादेव आराधना पूजन-अर्चन, अभिषेक से होती है। वहीं डाला स्थित चंद्रशेखर के स्वरूप वाले अचलेश्वर महादेव की आराधना के लिए परंपरागत पूजन-अर्चन पद्धति के साथ ही नृत्य और संगीत का भी सहारा लिया जाता है। सैकड़ों वर्षों से कायम इस परंपरा ने अब आधुनिक रूप ले लिया है और प्रतिवर्ष दो दिनी संगीत उत्सव का आयोजन कर महादेव के नटराजन स्वरूप की भी आराधना का क्रम जारी है। इस आयोजन में प्रतिभाग कर प्रख्यात ध्रुपद गायक गुडेचा बंधुओं के साथ ही कई नामचीन शख्सियतें अपने गीत-संगीत और नृत्य के जरिए महादेव की महिमा का गान कर चुकी हैं।
डाला में सीमेंट फैक्ट्री के पास वाली पहाड़ी पर वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग पर अचलेश्वर महादेव का शिवलिंग रूप में आकर्षक स्वरूप विद्यमान है। सैकड़ों वर्ष पूर्व यहां आदिवासियों और इलाके के लोग खुले में स्थित शिवलिंग पर घास-फूस का छाजन बनाकर आराधना-पूजन किया करते थे। विशेष अवसरों पर आराध्य देव को प्रसन्न करने के लिए नृत्य और संगीत का भी सहारा लेते थे। डाला सीमेंट फैक्ट्री की स्थापना के लिए 19 अक्टूबर 1968 को अचलेश्वर महादेव का भव्य मंदिर बनकर तैयार हुआ। इसके बाद इस मंदिर की प्रतिष्ठा दूर-दूर तक फैलने लगी और यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की भी संख्या बढने लगी। कुछ वर्ष बाद मंदिर के देखरेख के लिए अचलेश्वर महादेव मंदिर फाउंडेशन का गठन किया गया। गठन के साथ फाउंडेशन की तरफ से आधुनियक तरीके से प्रतिवर्ष दो दिनी संगीत उत्सव का आयोजन शुरू कर दिया गया। 108 सीढिय़ों वाले इस धाम में 40 वर्ष से भी अधिक समय से शिवरात्रि को होने वाले इस आयोजन में देश के साथ विदेश के भी शास्त्रीय और अन्य विधाओं के नामचीन गायकों का जमावड़ा लगता है। यहां की महत्ता को देखते हुए श्रावण सोमवार को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ तो उमड़ती ही है, कांवरियों का जत्था भी पहुंचता है। पूरे श्रावण मास मंदिर और आस-पास का इलाका हर-हर महादेव के घोष से गुंजायमान रहता है।
डाला। मान्यता है कि मंदिर में स्थापित चंद्रशेखर की मूर्ति पर लगे चंदन का आकार चंद्रमा के घटने और बढने (कृष्ण पक्ष-शुक्ल पक्ष) के साथ ही घटता-बढ़ता रहता है। यह भी मान्रूता है कि बसंत पंचमी, शिवरात्रि, नागपंचमी जैसे विशेष अवसरों पर यहां अर्धरात्रि के वक्त नागदेवता पूजन-अर्चन करने आते हैं। इस कारण मंदिर परिसर में अर्धरात्रि के वक्त किसी बाहरी व्यक्ति के रूकने की भी मनाही है।