चोपन। ब्रह्मपुत्र शोण (सोन), पौराणिक नदी रेणुका और बिजुल के गोठानी संगम तट पर शोभनाथ महादेव की महिमा अद्भुत है। यहां भगवान शिव के कई मंदिर, दर्जनों शिवलिंग, अष्टभुजा स्वरूपा मां पार्वती, विनायक, हनुमान सहित कई देवी-देवताओं की मूर्तियां जहां शिव नगरी का स्वरूप प्रदर्शित करती है। वहीं आठवीं-दसवीं शताब्दी के शैली में निर्मित मंदिरों का समूह और मंदिर से लेकर उत्तर-पूर्व में स्थित संगम तट की अलौकिक आभा विस्मित कर देती है। यहां हजारों वर्ष तक ऋषि मुनियों द्वारा शिव-शक्ति की आराधना किए जाने की मान्यता है। इस स्थल से कई चमत्कार, किंवदंतियां भी जुड़ी हुई हैं।
यहां विराजमान शोभनाथ महादेव शिवलिंग कहां से आया, इसके बारे में अलग-अलग मान्यताएं हैं। सबसे स्वीकार्य मान्यता चंद्रमा ऋषि से जुड़ी हुई है। बताते हैं कि प्राचीन काल में यहां चद्रमा ऋषि की कुटिया थी। उन्हें यह शिवलिंग स्वयंभू स्वरूप में मिला था, जिसकी उन्होंने प्रतिष्ठा कर पूजा-अर्चना शुरू की। मुगल काल में जब औरंगजेब ने मंदिरों में तोडफ़ोड़ शुरू की तो बचाव के लिए अद्भुत शिवलिंग को यहीं मिट्टी के नीचे छिपा दिया गया। बाद में एक व्यक्ति ने यहां कोल्हू की स्थापना की लेकिन जैसे ही उसने बैलों के सहारे कोल्हू घुमाना शुरू किया उसमें से तेल की जगह खून निकलने लगा। यह देखकर लोगों ने मिट्टी की खुदाई शुरू की तो अंदर शिवलिंग मिला। अगल-बगल की मिट्टी हटाकर शोभनाथ महादेव की पूजा-अर्चना शुरू कर दी गई। इस समय भी मंदिर का गर्भगृह कई फीट नीचे स्थित है, जिसे मिट्टी खुदाई के कारण नीचे होना बताया जाता है। मंदिर से कई किवदंतियां और चमत्कार भी जुड़े हुए हैं। पुरनिए बताते हैं कि 40-50 वर्ष पूर्व यहां एक बारात आई थी। संगम तट पर नहाते समय किसी बाराती ने मंदिर के प्रति उपहार भरे शब्द बोल दिए। तभी मंदिर से अचानक मगरमच्छ प्रकट हुआ और उसे खींचने लगा। यह देख मंदिर तट पर मौजूद लोगों ने भगवान शिव और मां अष्टभुजा की विनती शुरू कर दी। कुछ देर बाद ही मगरमच्छ उसे छोड़कर हट गया।