अनपरा। विजय दशमी के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने से सभी कार्यों की सिद्धि होने के साथ सारे अमंगल नष्ट हो जाते हैं तथा दु ष्वपनो का स्वत: निवारण हो जाता है। उक्त विचार अध्यात्म क्षेत्र के प्रकांड विद्वान पंडित डॉक्टर लक्ष्मी नारायण चौबे ने दशहरा पर्व पर एक धर्म चर्चा के दौरान व्यक्त करते हुये कहा कि शमी के वृक्ष में पाप खत्म करने की शक्ति होती है। किसी भी यज्ञ या शुभ कार्य के अनुष्ठान में शमी का पूजन व प्रयोग किया जाता हैं। शमी के वृक्ष में अन्य वृक्षों की अपेक्षा अग्नि प्रचुर मात्रा में विधमान होती है। श्री चौबे ने एक प्रसंग में कहा कि गुरु आरुणि के शिष्य कौस्तेय अपनी शिक्षा की अवधि पूरा होने पर गुरु दक्षिणा नही लेना चाहते थे । शिष्य के हट आग्रह पर गुरु ने दस लाख स्वर्ण मुद्राओं की मांग की ।कौस्तेय ने निर्धनता वश दानवीर राजा रघु के यहां स्वर्ण मुद्राओं की याचना की लेकिन राजा के पास भी इतनी धन राशि नही थी।फिर भी याचक कौस्तेय को खाली हाथ लौटना उन्हें कत्तई मंजूर नही था।राजा रघु ने निश्चय किया कि वे धनपति कुबेर पर आक्रमण कर कौस्तेय की समस्या का निराकरण करेंगें। युद्ध के लिये रथ पर अस्त्र शस्त्र सजाये गए और उन्होंने प्रस्थान किया।रास्ते मे रात्रि विश्राम के लिये अपना रथ शमी के वृक्ष के निचे रोक दिया। अगले दिन सोकर उठे तो आश्चर्य की सीमा न रही। कुबेर ने आक्रमण के डर से शमी वृक्ष के सारे पत्ते स्वर्णमय कर दिए थे। शिष्य ने गुरु दक्षिणा चुकाई तथा राजा रघु का कोष भी पुन: वैभव से परिपूर्ण हो उठा। अंत मे श्री चौबे ने शमी वृक्ष की भांति दृढ व तेजमय हो कि भावना लेकर शमी वृक्ष पयाी़वरण व धार्मिक दृष्टिकोण से सबसे उत्तम है। शमी वृक्ष दृढ़ता व तेजसिवता का प्रतीक है। इसलिए विजयादशमी के दिन शमी के वृक्ष की पूजा अवश्य करना चाहिए।