मुख्य अतिथि के तौर पर लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि समकालीन साहित्य के दैनिक जीवन से दूर होने के कारण पाठकों की संख्या कम हो गई। साहित्यकारों को पाठक वर्ग की रुचि के अनुसार साहित्य लिखना होगा।
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे डॉ. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ने कहा संवेदना व्यक्ति से समष्टि तक जानी चाहिए। जब हमारी दृष्टि खंड-खंड हो जाती है तो मनुष्य की अखंडता खतरे में आ जाती है। संचालन कर रहे डॉ. अरुण त्रिवेदी ने कहा अभी करुणा अंतिम कड़ी है जब कोई साधन न मिले तो करुणा का मार्ग अपनाना चाहिए।
समाज सुधार के लिए साहित्य के लेखन में खेमेबाजी बंद कर समाज को जोड़ने का काम करना होगा। महेंद्र प्रताप सिंह ने कहा जीवित रहने के लिए पर्यावरण की संरचना जरूरी है हम अन्य विमर्श पर लिखते हैं लेकिन पर्यावरण पर नहीं लिखते। प्रकृति चित्रण तो खूब लिखा गया लेकिन साहित्य में पर्यावरण लेखन जरूरी है।
अनिल अनवर ने कहा सबसे बड़ा समकालीन यथार्थ यह है कि हम पुराने मूल्यों को छोड़ नहीं पा रहे हैं, और नए मूल्य स्वीकार नहीं कर रहे हैं। नई पीढ़ी पुस्तक छोड़कर ई-बुक पढ़ रही है हमें उसे स्वीकार करना होगा। साहित्यकार को चाहिए ऐसा साहित्य लिखे जिससे नई पीढ़ी जुडे़।
रामजीत मौर्य ने कहा हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम सब संवेदनहीन हो गए हैं। धर्म से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है यह समकालीन यथार्थ है। ईश्वर युक्त समय को लाना होगा तभी निराशा हटेगी। डॉ. नीलमणि दुबे ने कहा यथार्थ कहता है जीवन ऐसा है, जबकि आदर्श कहता है जीवन ऐसा होना चाहिए।
गोष्ठी में विषय प्रवर्तन वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ. रचना भारती ने करते हुए कहा आज का किसान आत्महत्याएं कर रहा है जबकि प्रेमचंद का किसान आत्महत्या नहीं करता था बल्कि वह समस्याओं से जूझता था और समाधान खोजता था। समाज के बराबर ही चलकर समस्याएं दूर की जा सकती हैं।
इससे पूर्व गोष्ठी के अध्यक्ष, चंद दास शोध संस्थान के निदेशक चंद्रिका प्रसाद दीक्षित आदि ने मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलन कर की। कार्यक्रम के दौरान आए हुए विद्वानों का हिंदी सभा के अध्यक्ष डॉ. रमेश मंगल बाजपेई व महामंत्री दिनेश मिश्र राही ने अंगवस्त्र व स्मृतिचिह्न भेंटकर किया।
हिंदी सभा के द्वारा प्रतिवर्ष विद्वानों को दिया जाने वाला डॉ. गणेश दत्त स्मृति सम्मान चंद्रिका प्रसाद दीक्षित को डॉ. सारस्वत के पुत्र डॉ. सुनील सारस्वत व विश्वंभर नाथ मेहरोत्रा स्मृति सम्मान प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित को दिया गया। शासकीय कन्या महाविद्यालय सहडोल की हिंदी प्राध्यापिका डॉ. नीलमणि दुबे की कृति ‘दीवान-ए-आम’ और ‘ग्यारह दिन का’ लोकार्पण किया।
गोष्ठी में आए हुए लोगों का आभार प्रदर्शन डॉ. रचना भारती ने किया। कार्यक्रम के अंत में यशोदा कन्या विद्यालय की छात्राओं ने राष्ट्रगान प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में हिंदी सभा संरक्षक रमारमण त्रिवेदी, सुुरेश गुप्त, चंद्रेश शुक्ल, डॉ. अरुण त्रिवेदी, सहित रविकांत त्रिवेदी, राकेश गुप्त,राम प्रकाश पांडेय, गीता रस्तोगी आदि उपस्थित थे।