नैमिषारण्य (सीतापुर)। पौष माह की द्वादशी (15 जनवरी) को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा। इस पर्व पर पवित्र नदियों में स्नान कर खिचड़ी, कंबल व तिल से बनी चीजें दान करने का विशेष महत्व है।
मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश करते हैं। मान्यता है कि मकर संक्रांति पर सूर्यदेव अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं। शनिदेव मकर और कुंभ के स्वामी हैं। यह पर्व पिता-पुत्र के मिलन के लिए भी जाना जाता है। इसी कारण से इस दिन सूर्य पूजन का विशेष महत्व है। सूर्यदेव को अर्घ्य देकर उनके मंत्रों का जप करने से व्यक्ति को विशेष लाभ मिलता है। जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं, तब देवताओं का दिन माना जाता है।
आचार्य रमेश शास्त्री ने बताया मकर संक्रांति का पर्व आमतौर पर 14 जनवरी को मनाया जाता है, लेकिन इस बार 14 जनवरी की रात नौ बजकर 19 मिनट पर सूर्य, मकर राशि से उत्तरायण में प्रवेश करेंगे। इसलिए उदया तिथि के अनुसार स्नान व दान का पर्व 15 जनवरी, बृहस्पतिवार को मनाया जाएगा। 14 जनवरी को षटतिला एकादशी भी पड़ रही है। एकादशी को चावल का सेवन वर्जित है। ऐसे में
दो फरवरी से शुरू मांगलिक कार्य
प्राचार्य प्रभाकर द्विवेदी ने बताया कि सामान्यतया मकर संक्रांति के बाद से मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा। शुक्र ग्रह अस्त अवस्था में रहेंगे। शुक्र ग्रह को विवाह, सुख-सुविधा और मांगलिक कार्यों का कारक माना जाता है, इसलिए उनके अस्त रहने की स्थिति में विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्य करना उचित नहीं माना जाता। ऐसे में मकर संक्रांति के बाद भी मांगलिक कार्यों पर रोक बनी रहेगी। विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्यों की शुरुआत दो फरवरी के बाद ही होगी।