हर कोई आसमान की ओर टकटकी लगाए बारिश का इंतजार कर रहा है लेेकिन जिले का एक हिस्सा ऐसा भी है, जहां बारिश का मौसम करीब आते ही किसानों की धड़कनें तेज हो जाती हैं। उन्हें बरसात किसी आफत से कम नहीं लगती। हम बात कर रहे हैं, जिले के गांजरी क्षेत्र की। जहां पर घाघरा बरसात के मौसम में कहर बरपाती है।
सैकड़ों गांवों में बाढ़ आती है तो दर्जनों कटान की भेंट चढ़ जाते हैं। किसानों के सामने ही फसल तबाह हो जाती है। कुछ अपनी जान गंवा देते हैं तो कुछ के अरमान बाढ़ के पानी में बह जाते हैं। हर बार प्रशासन अगली बार बेहतर इंतजाम की दुहाई देता है पर समय बीतने के बाद लोग यह दर्द भूल जाते हैं। अब बारिश का मौसम आते ही गांजर के लोग एक बार फिर से डरे हुए हैं। प्रशासन बाढ़ से निपटने को लेकर अब तक संजीदा नजर नहीं आ रहा है।
जिले के गांजरी क्षेत्र में लहरपुर, बिसवां व महमूदाबाद तहसील क्षेत्र के करीब डेढ़ सौ गांव शारदा व घाघरा के तट पर बसे हैं। यहां की 47 हजार से अधिक आबादी प्रतिवर्ष बाढ़ का दंश झेलती है। इनमें सबसे अधिक तबाही बिसवां में घाघरा के तट पर बसे गांवों में होती है।
बरसात के दिनों में अचानक घाघरा का पानी बढ़ता है और वह 20 किलोमीटर से अधिक के दायरे में बर्बादी मचाता है। कटान भी होती है, जिसकी वजह से तटीय इलाके के गांवों में बसे लोगों को घर छोड़कर भटकना पड़ता है। मुसीबत इस कदर आती है कि सड़कों पर ही आशियाना बनाना पड़ता है। आज भी क्षेत्र की तमाम सड़कों ने आबादी का रूप ले रखा है।
लोग सड़क पर रहने को मजबूर हैं। प्रशासन उन्हें सिर्फ दिलासा ही दे पा रहा है। हर साल कुछ ऐसा ही होता। बावजूद इसके बाढ़ व कटान से निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। निर्मल पुरवा गांव के संतोष यादव, दिनेश, सिरदार, राम नरेश, सिसैया बाजार के रामनाथ मंगरे, चंद्रभालपुरवा के भगौती, नंदन आदि का कहना है कि इस क्षेत्र में लंबे समय से मांग हो रही है कि घाघरा के तट पर तटबंध बना दिया जाए, जिससे तटीय क्षेत्र में बसने वाली आबादी बाढ़ व कटान से सुरक्षित हो सके ।
पर जिम्मेदार ध्यान नहीं दे रहे हैं। जब बाढ़ व बरसात चली जाती है, तब प्रशासन के पास इतना मौका जरूर होता है कि वह अपनी योजनाओं को अमली जामा पहनाकर बाढ़ से निपटने का इंतजाम कर सकें, लेकिन समय रहते कोई ध्यान नहीं देता।
हर वर्ष बाढ़ आती है। कटान होती है। लोग अपनों को खोते हैं। रात की नींद व दिन का चैन छिन जाता है। खाने को कौन कहे, साफ पानी तक मयस्सर नहीं होता। इसके बावजूद जिले के अफसर संजीदा नजर नहीं आ रहे हैं।
सड़क पर ही बस गए
रेउसा क्षेत्र के मेड़ईपुरवा के पैरू, पटवारी, राम मिलन आदि परिवार के साथ सड़क पर ही आशियाना बनाकर रह रहे हैं। गोड़ियनपुरवा गांव के बांके कमलेश, लाल आदि ने गांव से कुछ दूरी पर सड़क पर ही झोपड़ी डाल रखी है। सिसैया बाजार, कोनी व चंद्रभाल पुरवा के लोग सड़क पर रहते हैं।
इन परिवारों का कहना है कि 2014 में कटान के कारण घर तबाह हो गए। जिसके बाद खेतों में आशियाने बना लिए, लेकिन वहां भी घाघरा ने पीछा न छोड़ा। खेत नदी में समा गए, तब वे सड़क पर आकर बस गए। गोड़ियन पुरवा के 80 घर, मेड़ई पुरवा के 60 घर, सिसैया बाजार के 25 व कोनी के 10 घर कटकर घाघरा नदी में समा चुके हैं। यहां के लोग अब सड़कों पर रहते हैं।
जहां बसे, वहां भी बर्बादी
टिब्भा, कोनी, चंद्रभाल पुरवा, सिसैया बाजार, गोड़ियन पुरवा, मेड़ई पुरवा आदि गांव ऐसे गांव हैं जहां पर काफी समय से घाघरा कहर बरपा रही है। यहां बाशिंदे गांव खत्म होने के बाद दूसरे स्थान पर अपना घर बना चुके थे। बावजूद इसके घाघरा ने फिर से इन गांवों को तबाह कर दिया।
सूनी हैं ईद की खुशियां
रमजान का महीना और उसके बाद ईद की तैयारी को लेकर लोग व्यस्त नजर आते हैं, लेकिन यहां ईद की खुशियां फीकी हैं। जंगल टपरी में कबरियन पुरवा गांव के परिवार रह रहे हैं। मोहममद रफी, मोहम्मद इकबाल, मुरसुद्दीन, मुस्ताक, अनवर, बरसाती, अलीजान, मुख्तार, सहाबुद्दीन, गफ्फार, अहीदुल आदि परिवारों ने बताया कि वे यहां पर दो वर्षों पूर्व बर्बाद होने के बाद यहां पर आकर बसे।
इतना लंबा समय बीतने के बावजूद उनकी जिंदगी की गाड़ी पटरी पर नहीं आ सकी है। ईद आ गई है, लेकिन सिर पर घाघरा की बाढ़ का भय सता रहा है। न जाने कब और किस दिन घाघरा का पानी बढ़े और यह क्षेत्र समंदर बन जाए। इन परिवारों ने बताया कि घर सहेजने में ही इतना रुपया खर्च हो जा रहा है कि त्योहार मनाने के लिए उनके पास पैसा ही है। दो वक्त की रोटी का इंतजाम बड़ी मुश्किल से कर रहे हैं। ईद मेें मिठाई, सेर्वइं व कपड़े का इंतजाम कहां से करेंगे। कुल मिलाकर ईद की खुशियां बेरंग हैं।