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सरकार के ऐलान से सैनिक खुश पर संतुष्ट नहीं

Tue, 08 Sep 2015 11:43 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ सीतापुर
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लंबे समय से वन रैंक वन पेशन की मांग को लेकर चले आ रहे पूर्व सैनिकों के आंदोलन के दबाव में आकर मोदी सरकार ने भले ही मांग पूरी करने का ऐलान कर दिया, लेकिन पूर्व सैनिक अभी संतुष्ट नहीं है।
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पूर्व सैनिकों का कहना है कि प्रधानमंत्री का फैसला सराहनीय व स्वागत योग्य है, लेकिन उन्हें उनकी अन्य मांगों पर भी ध्यान देना चाहिए। वहीं सैनिक यह भी कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री के ऐलान से उन्हें अन्य मांगों के पूरा होने की उम्मीद जागी है।

सेना में सुबेदार पद पर तैनात रहे विनय कुमार कहते हैं कि प्रधानमंत्री का फैसला स्वागत योग्य है, लेकिन उन्होंने बाकी मांगों को अनदेखा कर दिया है। इससे प्रधानमंत्री के फैसले पर खुशी जाहिर की जा सकती है, लेकिन संतुष्ट होना नहीं कहा जा सकता है।
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करीब पांच अन्य मांगे हैं, जिन्हें पूरा नहीं किया गया है। हालांकि वन रैंक वन पेंशन की मांग पूरी होने पर एक उम्मीद जागी है कि अन्य मांगें भी जल्द ही पूरी हो सकेंगी।

सेना में नायक पद पर तैनात रहे अशोक कुमार कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने वन रैंक वन पेंशन की घोषणा कर दी। इसमें खामी यह है कि उन्होंने इसे वर्ष 2013 से लागू किया है। जबकि मांग थी कि 2015 से लागू की जाए।

इसके अलावा अन्य मांगें न मान कर सरकार ने खुशी में ब्रेक लगाने का काम किया है। इससे संतुष्टि तो नहीं मिली, लेकिन यह जरूर है कि वर्षों से चले आ रहे आंदोलन के मेहनत का थोड़ा फल जरूर मिला है।

नायक पद पर तैनात रहे नंद किशोर वर्मा कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने ऐलान कर दिया, लेकिन उसमें कई खामियां छोड़ दी। जैसे एरियर का भुगतान एकमुश्त न होना, टुकड़ों में होना। इससे उस धन का लाभ सैनिकों को अधिक नहीं मिल सकेगा। वर्ष 2013 से वन रैंक की पेंशन देना भी ठीक नहीं है, यह पेंशन 2015 से देनी चाहिए।

प्रधानमंत्री के इस ऐलान से खुशी मिली है, लेकिन पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हैं। जब तक अन्य मांगों को पूरा नही किया जाता तब यह खुशी अधूरी। सेना में सिपाही पद से रिटायर हुए राजकुमार ठाकुर कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने वन रैंक वन पेंशन को लेकर ऐलान किया, उनका फैसला स्वागत योग्य है।

प्रधानमंत्री अन्य मांगों को पूरा करें, तब और भी बेहतर रहेगा। आज स्थिति यह है कि सैनिक पूरी जवानी सेना में लगा देता है, उसके बाद जब सहारे का वक्त आता है, तब उसे तनख्वाह का आधा हिस्सा मिलना शुरू होता है।

ऐसे में परिवार का खर्च वह कैसे उठाए और रोजगार तलाशने कहां जाए, ऐसे तमाम सवाल उसके सामने खड़े रहते हैं। सरकार ऐसे कदम उठाए जिससे लोग सेना में जाने के लिए बेताब दिखें, वर्ना लोग अब सेना में नहीं जाना चाह रहे हैं।
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