सीतापुर। कभी घर की दहलीज से बाहर निकलने पर पाबंदी थी। सामाजिक बंदिशों के बीच जिंदगी घर और परिवार तक सीमित थी। पढ़ाई भी पांचवीं कक्षा तक ही हो सकी थी लेकिन परिस्थितियों के आगे हार मानने के बजाय रामबेटी ने अपने लिए एक नई राह चुनी।
पिसावां ब्लॉक के अल्लीपुर गांव की रामबेटी ने घर की चारदीवारी से निकलकर मजदूरों के अधिकारों की आवाज उठानी शुरू की। धीरे-धीरे उनका संघर्ष व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढ़ा और गांव के दूसरे परिवारों की जरूरतों से जुड़ गया। जिससे वह ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी, आत्मनिर्भरता और सामाजिक बदलाव की मिसाल के रूप में पहचान बनाने में सफल रही।
रामबेटी का सफर आसान नहीं था। सीमित शिक्षा और सामाजिक बंदिशों के बीच सार्वजनिक जीवन में कदम रखना उनके लिए बड़ी चुनौती थी। वह बताती हैं कि वर्ष 2002 में महिला समाख्या से जुड़ीं। इसके बाद वर्ष 2006 में समता किसान मजदूर संगठन से जुड़कर सक्रिय हुईं। पति जगन्नाथ ने भी उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। परिवार के इस सहयोग ने रामबेटी को अपने दायरे से बाहर निकलकर समाज के मुद्दों पर काम करने का हौसला दिया। उनका मानना था कि जब महिलाएं अपने सवालों को सार्वजनिक मंच पर उठाने लगती हैं, तो उनकी आवाज परिवार से निकलकर समाज तक पहुंचती है।