सीतापुर/सिधौली। सरायन नदी लोगों के लिए कभी जीवनदायिनी हुआ करती थी। इंसानों के अलावा पशु-पक्षी इसके शीतल जल से तृप्त होते थे। किसानों के लिए इसका जल वरदान था। इसके जल से हजारों बीघा खेतों में फसलें लहलहाया करती थी। पर अब कूड़ा-कचरा डालकर नदी को प्रदूषित किया जा रहा है। शासन-प्रशासन भी इसकी सफाई को लेकर संजीदा नहीं है। नदी अब एक गंदे नाले जैसी दिखने लगी है। प्रदूषण व गंदगी के कारण इसका अस्तित्व संकट में है।
जिले की सीमा में सरायन नदी का प्रवेश ऐलिया ब्लॉक के सधुवापुर गांव के पास होता है। शहर के मध्य से होकर बहने वाली सरायन नदी की जिले में कुल लंबाई लगभग 120 किलोमीटर है। सीतापुर, रामकोट, कमलापुर इलाके में होकर बहने वाली नदी लालपुर घाट से सिधौली तहसील क्षेत्र में पहुंचती है। भानपुर, लखनापुर, बसईडीह, बहरीमऊ, जटहा, बाड़ी, मोहिद्दीनपुर और कोनीघाट होते हुए सरायन नदी भटपुर के पास आदि गंगा गोमती में मिल जाती है।
सिधौली इलाके में एक दशक पहले तक तटीय क्षेत्र के सैकड़ों गांवों के लिए सरायन नदी जीवनदायिनी हुआ करती थी। किसान अपने खेतों की सिंचाई करते थे। सरायन का स्वच्छ और शीतल जल इंसानों के साथ ही पशु-पक्षियों की प्यास बुझाता था। भरपूर दोहन और दुरुपयोग के कारण इसका पानी अब स्वच्छ नहीं रह गया है। जीवनदायिनी सरायन का प्रदूषित जल अब मछलियों, पशु-पक्षियों के लिए घातक साबित हो रहा है।
प्रदूषण व गंदगी से बुरी तरह जकड़ी सरायन अपना मूल स्वरूप खोने लगी है। कोनीघाट के करीब सरायन नदी किसी गंदे नाले की तरह नजर आने लगी है। काई, कूड़ा-कचरा और जलकुंभी ने इसकी सतह पर कब्जा जमा लिया है। दिनोंदिन सिकुड़ती जा रही नदी के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। सरायन नदी फिर से पहले वाला स्वरूप पाने को किसी भागीरथ के इंतजार में है।
नदी को कर रहे मैला
नदी लगातार मैली हो रही है। किसानों ने भी नदी तट तक कब्जा कर लिया है। गंदा पानी नदी में गिराने और मछलियों के शिकार के लिए जहर डालने से नदी प्रदूषित हो रही है। कूड़ा-कचरा भी इसमें डाला जा रहा है। तट पर लगे पेड़ों की भी कटान से इसके अस्तित्व पर संकट छा गया है।
फाइलों में कैद जीर्णोद्धार की कवायद
सरायन नदी के जीर्णोद्धार की कवायद सरकारी फाइलों में कैद होकर रह गई है। 2017 में तत्कालीन डीएम सारिका मोहन फिर 2018 में तत्कालीन डीएम शीतल वर्मा ने सरायन के जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया था। सरायन को मूर्त स्वरूप देने के लिए तट पर पौधरोपण, सफाई आदि का खाका खींचा गया था। जिन अफसरों ने यह बीड़ा उठाया उनके तबादले के बाद सारी कवायद फाइलों तक सिमटकर रह गई।
दुर्दशा से पर्यावरण प्रेमी आहत
पर्यावरण प्रेमी भगवती प्रसाद अग्निहोत्री कहते हैं कि नदियों का अस्तित्व बचाए रखने के लिए संकल्प लेना होगा। पर्यावरण प्रेमी अनूप कुमार का कहना है कि नदियों को प्रदूषित कर उनका वजूद खतरे में डालने के जिम्मेदार हम सब हैं। शासन-प्रशासन भी नदियों का जल स्वच्छ व शीतल बनाए रखने को लेकर संजीदा नहीं है, यह एक बड़ी विडंबना है। छोटी नदियां समय के साथ खत्म होती जा रही हैं। सरायन भी नाले सरीखी दिखने लगी है। इस तरह तो प्राकृतिक व्यवस्था ही बिगड़ जाएगी।