दस मार्च को नैमिषारण्य की धरती से 84 कोसीय परिक्रमा को कूच करने वाला रामादल शुक्रवार को एक बार फिर नैमिषारण्य पहुंच गया। घंटे, घड़ियाल, श्रीराम के जयघोष के साथ शंखनाद करते हुए रामादल ने नैमिषारण्य में प्रवेश किया।
जिसके बाद श्रद्धालुओं ने अपना डेरा जमाया। कुछ नैमिष के आश्रमों में, कुछ धर्मशालाओं में तो कुछ खुले मैदान में आपना टेंट लगाकर ठहर गए। यहां पर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या करीब पांच लाख बताई जा रही है।
गुरुवार को रामादल ने जरिगवां पड़ाव पर रात्रि विश्राम किया। शुक्रवार की भोर डंके की ध्वनि पर श्रद्धालुओं ने नैमिषारण्य के लिए कूच किया। नैमिषारण्य में डेरा डालने के बाद श्रद्धालुओं ने आदि गंगा गोमती व चक्रतीर्थ में डुबकी लगाई।
जिसके बाद शक्तिपीठ मां ललिता देवी, व्यास गद्दी, हनुमान गढ़ी, देव देवेश्वर आदि मंदिरों में माथा टेका और पूजा-अर्चना की। इस दौरान तमाम ऐसे भी श्रद्धालु थे, जो भंडारे का आयोजन कर रहे थे। परिक्रमा को पहुंचे श्रद्धालुओं ने इन भंडारों पर प्रसाद ग्रहण किया। विभिन्न आश्रमों में संत व मंहत श्रद्धालुओं को वेद, पुराणों का ज्ञान देते रहे।
लखनऊ से 80 किमी दूर है नैमिषारण्य
ऐतिहासिक नैमिषारण्य तीर्थ प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 80 किमी दूर गोमती नदी के बाएं तट पर स्थित है। यह हिन्दू तीर्थों में एक है। मार्कंडेय पुराण में अनेक बार इसका उल्लेख हुआ है। जिसमें 88 हजार ऋषियों की तपस्थली बताया गया है।
वायु पुराण में माघ माहात्म्य तथा बृहद्धर्मपुराण पूर्व भाग के अनुसार इसके किसी गुप्त स्थल में आज भी ऋषियों का स्वाध्यायानुष्ठान चलता रहता है। लोमहर्षण के पुत्र सौति उग्रश्रवा ने यहीं ऋषियों को पौराणिक कथाएं सुनायी थीं।