इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश धनंजय यशवंत चंद्रचूड ने कहा अधिवक्ता जाति-धर्म के बंधनों से परे होते हैं। अधिवक्ता का एक ही धर्म ‘संविधान’ होता है।
न्याय की परख कर अपने धर्म का पालन करें। मुख्य न्यायाधीश शनिवार को यहां वरिष्ठ अधिवक्ता स्व. बाबू इंद्रपाल सिंह व विश्वपाल सिंह के चित्रों का अनावरण करने आए थे।
अनावरण के बाद शहर के राइफल क्लब में उन्होंने अधिवक्ताओं से कहा कि आप लोग सरस्वती का पूजन करें। लक्ष्मी स्वयं आपके पास आएंगी। वह बोले, व्यक्ति को धन लोलुप नहीं होना चाहिए।
पद से बहुत ज्यादा जुड़ाव भी ठीक नहीं है, क्योंकि पद तो आता-जाता रहता है। अधिवक्ता समाज के युग प्रवर्तक होते हैं। उनके हाथों में न्याय की चाभी होती है।
इसलिए ऐसा आचरण भूलकर भी न करें जिससे समाज में गलत संदेश जाए। चीफ जस्टिस ने संन्यासी जीवन पर रोशनी डाली। कहा कि संन्यास लेने का मतलब साधु बनकर हिमालय पर चले जाना नहीं है।
संन्यास का अर्थ यह है, कि आप अपने जीवन में बदलाव लाना चाहते हो। बुरे आचरण व बुरी आदतें त्यागकर सद्मार्ग पर चलना संन्यास है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मैंने एक समय का भोजन त्याग दिया और आध्यात्मिक विचारधारा का हो गया हूं।
यह भी एक तरह का संन्यास है। मुख्य न्यायाधीश ने महिलाओं के आदर व सम्मान पर विशेष जोर देते हुए कहा कि जिस परिवार में महिलाओं का सम्मान होता है, मेरी नजर में वह आदर्श परिवार है।
उन्होंने कहा आज न्यायपालिका में 40 फीसदी जज महिलाएं हैं। महिलाओं के सम्मान से ही आदर्श समाज की संरचना संभव है। कार्यक्रम में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार त्रिपाठी, एसवीएस राठौर, एसके सक्सेना, आलोक कुमार सिंह, वीके दीक्षित, वीरेंद्र विक्रम सिंह, बीके श्रीवास्तव, अब्दुल मतीन, अश्विनी कुमार सिंह आदि ने भी अपने विचार रखे।
कार्यक्रम का संचालन अधिवक्ता अरविंद मोहन मिश्र ने किया। इस अवसर पर सेवानिवृत्त न्यायाधीश विष्णु सहाय, डीपी सिंह, डीके त्रिवेदी, डीएम डॉ. इंद्रवीर सिंह यादव, एसपी कवींद्र प्रताप सिंह, निवर्तमान एमएलसी राकेश सिंह, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष हरीश त्रिपाठी आदि उपस्थित रहे।