नैमिष चक्रतीर्थ में डुबकी लगाते श्रद्धालु।
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वैसे तो 84 कोसी परिक्रमा की बराबरी किसी से नहीं की जा सकती है, लेकिन जब 84 कोसी परिक्रमा करने वाले संत, महंत मिश्रिख पहुंच जाते हैं। तब मिश्रिख की पंच कोसी परिक्रमा करने वाले को 84 कोसी परिक्रमा के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।
बनगढ़ आश्रम के महंत संतोष दास का कहना है कि नैमिषारण्य से 84 कोसी परिक्रमा को निकलने वाले संत, महंत, साधु व श्रद्धालु मिश्रिख पहुंचने तक काफी पुण्य अर्जित कर लेते हैं। मिश्रिख पहुंचने के बाद, संत, महंत व साधु अपने कमाए गए पुण्य को बांटने के लिए मिश्रिख के पांच कोस में डेरा डालते हैं।
पंच कोसीय परिक्रमा के दौरान श्रद्धालु महर्षि दधीचि के तीर्थ, मंदिर की तो परिक्रमा करते ही हैं, वहीं 84 कोसी परिक्रमा पूरी कर चुके, साधु, संत व महंतों की भी परिक्रमा करते हैं। इस वजह से संत, महंतों का पुण्य पंच कोसी परिक्रमा करने वालों को मिलता रहता है।
मिश्रिख से शुरू हुई होली
बनगढ़ आश्रम के महंत संतोषदास कहते हैं कि विश्व भर में होली की शुरूआत मिश्रिख की धरती से ही हुई थी। उन्होंने कहा कि द्वापर युग में हिरण्याकश्यप हरदोई जिले का रहने वाला था।
भक्त प्रहलाद से रुष्ट होने पर उसने अपनी बहन होलिका को प्रहलाद को आग में जला देने का आदेश दिया। होलिका भक्त प्रहलाद को लेकर जिस स्थान पर आग में बैठी थी। वह स्थान महर्षि दधीचि की तपोभूमि मिश्रिख ही है। इसलिए इस धरती का अलग ही महत्व है। यही वह धरती है, जहां से होली के त्योहार की शुभारंभ हुआ था।