पितृ पक्ष में तर्पण करने से पितरों को मोक्ष मिलता है। पुरखे संतुष्ट होकर निरोग, चिरायु, श्रेष्ठ. संतान व धनादि का आशीर्वाद देते हैं। शास्त्रों के अनुसार नैमिष के पौराणिक स्थलों नाभिगया (काशीकुंड) व चक्रतीर्थ पर श्राद्ध व तर्पण का विशेष महत्व है।
इसीलिए पितृ पक्ष में देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां तर्पण करने आते हैं। पड़ोसी देश नेपाल और श्रीलंका से भी पितृ पक्ष में श्रद्धालु नैमिष पहुंचते हैं। अश्विन मास का कृष्ण पक्ष पितरों का पक्ष होता है। इसमें पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध का विधान सतयुग से चला आ रहा है। पुराणों के अनुसार सभी लोकों में विख्यात नैमिष तीर्थ कष्ट हरने वाला है।
यहां अन्नदान, पिंडदान, श्राद्ध, तप, यज्ञादि करना श्रेयष्कर है। यह क्रम पितृ विसर्जनी अमावस्या तक जारी रहता है। नैमिष के आचार्यों के अनुसार जो व्यक्ति चक्रतीर्थ में स्नान कर पिंड दान व तर्पण करते हैं। उसे धार्मिक पुण्य के साथ ही उनके पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
जौ, तिल व चावल सहित जल पितरों को सूर्यदेव के माध्यम से दिया जाना ही तर्पण है। तर्पण के समय कुश जरूरी है। वैदिक परंपरा की श्राद्ध विधि में चार कर्म बताए गए हैं। पिंडदान, हवन, तर्पण व ब्राह्मणों को भोजन। इसीलिए पितरों की तिथियों पर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।
नैमिष में श्राद्ध व तर्पण के विशेष महत्व को देखते हुए यहां देश के कोने-कोने से लोग आते हैं। पितृ पक्ष में पड़ोसी देश नेपाल व श्रीलंका तक से श्रद्धालु नैमिष पहुंचकर पितरों को मोक्ष की कामना से तर्पण व दान-पुण्य करते हैं।
इसलिए है विशेष महत्व
बद्रीनारायण धाम में कपाल गया, गयाजी में चरण गया और नैमिषारण्य धाम में नाभि गया। किसी वजह से उक्त दो गया में पितरों का तर्पण न कर पाने की दशा में भी नैमिष के नाभिगया तथा काशीकुंड में तर्पण करने से पितरों को मोक्ष मिल जाता है।