जबकि मंदिर के सामने ही ग्रामीण गोबर के उपले पाथ रहे हैं। मंदिर के नाम पर एक चबूतरा ही है। जबकि पड़ाव के लिए महज एक सड़क है। बदहाली इस कदर है कि करीब स्थित गांव के लोग ही इस पड़ाव का इतिहास भूल गए हैं। वहीं जिम्मेदार भी लापरवाही बरत रहे हैं, जिसके चलते यह पड़ाव अपना अस्तित्व खोता जा रहा है।
परिक्रमा मार्ग पर पड़ने वाले आठवें पड़ाव जरिगवां खुद में एक इतिहास समेटे हुए है। कहते हैं कि एक समय था, जब यहां पर जरत्कारु मुनि ने तपस्या की थी। जबकि महर्षि दधीचि के आह्वान पर भगवान माधव का भी यहां पदार्पण हुआ था। जरत्कारू मुनि के नाम पर ही पहले इस पड़ाव का नाम जरत्कारू पड़ा।
जिसके बाद करीब ही गांव बस गया। समय के साथ उस गांव को जरिगवां नाम दे दिया गया। तब से लोग इस पड़ाव को जरिगवां के नाम से जानते आ रहे हैं। परिक्रमा के दौरान महर्षि दधीचि व भगवान श्रीराम का आगमन भी यहां हो चुका है। विद्वानों का मत है कि अपने वनवास के दौरान पांचो पांडव भी इस परिक्रमा में हिस्सा ले चुके हैं।
भगवान माधव के आगमन के बाद यहां पर भगवान माधव का मंदिर बनाया गया। आज भी जरिगवां पड़ाव पर भगवान माधव का मंदिर बना हुआ है। भगवान माधव विष्णु का रूप हैं। यह स्थान बेहद पवित्र है। यही वजह है कि परिक्रमार्थी अपनी परिक्रमा के दौरान आठवें दिन यहां पर पड़ाव डालते हैं, भजनों से रात को गुलजार करते हैं।
सुबह भगवान माधव के दर्शन के बाद अगले पड़ाव को रवाना होते हैं। एक समय था, जब इस पड़ाव पर लाखों श्रद्धालुओं के ठहरने का स्थान था। आज हालत यह है कि माधव भगवान के मंदिर के करीब 50 की संख्या में ही श्रद्धालु ठहर सकते हैं। जबकि अन्य श्रद्धालुओं को परिक्रमा मार्ग की सड़क पर ही डेरा डालना पड़ेगा।
वहीं श्रद्धालु खेतों व बागों में डेरा डालने को मजबूर होंगे। आखिर पड़ाव स्थल की जमीन कहां चली गई, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। मंदिर के करीब ही गांव के लोग गोबर के उपले पाथ रहे हैं। कुल मिलाकर यह तीर्थ स्थल पूरी तरह से बदहाली का दंश झेल रहा है।