जिला अस्पताल हो या महिला अस्पताल। यहां पर आग से निपटने के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। आपात स्थिति में मरीजों को भवन से निकाल पाना मुश्किल है। अस्पतालों में लगे अलार्मकाम नहीं कर रहे हैं।
दमकल विभाग ने हाल ही में यहां के कर्मचारियों को आग से निपटने के तरीके बताए हैं पर अस्पताल प्रशासन असहाय सा नजर आ रहा है। लखनऊ के ट्रॉमा सेंटर में लगी आग के बाद भी जिला प्रशासन नहीं चेत रहा है।
जिला अस्पताल में हड्डी रोग, बाल रोग व महिला रोग वार्डों के मरीजों को बाहर निकालने के लिए महज एक ही रास्ता है। हड्डी रोग वार्ड में मरीजों को बेड तक पहुंचाने में ही तीमारदारों के पसीने छूट जाते हैं।
वजह यह है कि हड्डी वार्ड में ही पेइंग वार्ड बनाया गया है। इससे मरीजों के आने-जाने के लिए एक गली ही बची है। 36 बेड वाले इस वार्ड में मरीजों के साथ करीब 150 तीमारदार भी हर वक्त मौजूद रहते हैं।
ऐसे में पतली गली मुसीबत साबित होगी। बता दें कि इस वार्ड के ठीक बाहर चिल्ड्रेन वार्ड की सीढ़ियां उतरती हैं। चिल्ड्रेन वार्ड हड्डी वार्ड की छत के ऊपर है। उसमें करीब 37 बेड हैं।
आपात स्थिति में बच्चों को जीने से उतारने के शिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। करीब में एक दरवाजा तो है लेकिन वह इतना सकरा है कि एक वक्त में एक ही आदमी निकल सकता है। इसलिए उस दरवाजे का इस्तेमाल आपात स्थिति में नहीं हो सकता।
इमरजेंसी वार्ड के ठीक बगल में महिला वार्ड है। इस वार्ड के मरीजों को भी अगर आपात स्थिति में निकालना हो तो उन्हें भी इमरजेंसी के सामने से ही गुजरना पड़ेगा। ऐसे में आपात स्थिति में इस वार्ड के मरीजों को भी बचा पाना बेहद मुश्किल साबित हो सकता है।
महिला अस्पताल की हालत तो इससे भी खराब है। यहां तो इमरजेंसी में ही 41 बेड हैं, लेकिन उन सभी मरीजों को बाहर निकालने व अंदर ले जाने के लिए महज एक ही दरवाजा है। दरवाजे से एक समय में एक ही मरीज बाहर निकाल सकता है।
इमरजेंसी के अलावा अन्य वार्ड भी मौजूद हैं, लेकिन उन वार्डों में भी मरीजों को आसानी से बाहर नहीं निकाला जा सकता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि दोनों अस्पतालों के सेफ्टी अलार्म खराब हैं।