सीतापुर। यूपी के मॉफिया मुख्तार अंसारी को पंजाब के मोहाली कोर्ट में पेशी के लिए ले जाने वाली एंबुलेंस ही नहीं सीतापुर की कई एंबुलेंस भी सवालों के घेरे में हैं। जी हां, सुनकर चौंकिए मत। ये सौ फीसदी सच है। जिले की एंबुलेंस में बाहुबली मुख्तार अंसारी की एंबुलेंस जैसा कनेक्शन भले ही नहीं निकल रहा हो, लेकिन जिम्मेदारों की लापरवाही हैरान कर देने वाली है। अनफिट एंबुलेंस मरीजों को लेकर सड़कों पर फर्राटा भर रही हैं। यही नहीं, रोक के बावजूद निजी नाम पर दर्ज एंबुलेंस भी दौड़ाई जा रहीं हैं। ऐसे में प्रवर्तन दल की ओर से लंबे समय से कोई कार्रवाई न करके मामले में खामोशी अख्तियार करना भी कम गंभीर मसला नहीं हैं। हालांकि, इसको लेकर जिम्मेदार अलग ही राग अलाप रहे हैं।
जिले में सरकारी, गैर सरकारी जो भी एंबुलेंस होती हैं, उनका पंजीकरण एआरटीओ दफ्तर में होता है। पंजीयन होने के बाद एंबुलेंस की निगरानी की जिम्मेदारी एआरटीओ प्रवर्तन की होती है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि एआरटीओ दफ्तर में दर्ज एंबुलेंस में से 44 ऐसी हैं, जो सड़कों पर चलने के लायक ही नहीं हैं। मसलन, इन 44 एंबुलेंस का फिटनेस ही खत्म हो चुका है, लेकिन इसके बाद भी वह सड़कों पर मरीजों को लेकर बेरोक टोक फर्राटा भर रही हैं। जिनके जिम्मे कार्रवाई करने की जिम्मेदारी है, वह मौन साधे हुए हैं। यही वजह है कि लंबे समय से एआरटीओ प्रर्वतन की ओर से नियमों को दरकिनार दौड़ाई जा रहीं एंबुलेंस के खिलाफ कोई कार्रवाई की ही नहीं गई।
कार्रवाई न होने से ही बेखौफ चालक अनफिट वाहनों में मरीजों को ढो रहे हैं। ऐसे में मरीजों की जान भी सांसत में हैं। इसके अलावा करीब 12 ऐसी एंबुलेंस सड़कों पर दौड़ रही हैं, जो किसी अस्पताल, संस्था के नाम से रजिस्टर्ड नहीं हैं बल्कि व्यक्ति के नाम से हैं। जबकि इस पर रोक लगी हुई है। किसी भी व्यक्ति के नाम से एंबुलेंस का पंजीकरण नहीं होने के आदेश के बाद भी जिले में निजी नाम पर एंबुलेंस चलाई जा रही हैं। हालांकि, इसको लेकर जिम्मेदारों का कहना है कि जो भी एंबुलेंस किसी व्यक्ति के नाम पर चल रही हैं, उनका पंजीयन आदेश आने से पहले का है। इसलिए गैरकानूनी नहीं हैं। (संवाद)
टैक्स बचाने को ऐसे होता है खेल
सूत्रों की माने तो बेहद शातिर दिमाग वाले लोग वैन खरीदने के बाद टैक्स बचाने के लिए गाड़ी का एंबुलेंस में पंजीकरण करा देते हैं। गाड़ी का एंबुलेंस में पंजीयन होने के बाद टैक्स फ्री हो जाता है। जानकार बताते हैं कि अभी तक ऐसे लोग अपने नाम से ही पंजीयन करा लेते थे, लेकिन इस पर रोक लगने के बाद अब अस्पताल से सेटिंग कर एआरटीओ दफ्तर में अस्पताल के दस्तावेज लगाकर पंजीकरण कराते हैं। इससे उनकी गाड़ी भी चलती रहती है और टैक्स भी नहीं देना पड़ता है। ऐसा करके मास्टर माइंड राजस्व को बड़े पैमाने पर चपत लगा रहे हैं।
जिला अस्पताल के बाहर सजता है एंबुलेंस का बाजार
नियम-कानून को दरकिनार कर एंबुलेंस का बाजार जिला अस्पताल और जिला महिला अस्पताल के बाहर सजता है। सुबह से शाम, दिन से रात तक यहां पर एंबुलेंस सड़कों के किनारे लगी आपको मिल जाएंगी। सूत्रों की माने तो एंबुलेंस चालकों की नजर अस्पताल से रेफर होने वाले मरीजों पर ही रहती है। अगर मरीज को समय रहते सरकारी एंबुलेंस की सेवा नहीं मिली तो वह जल्द अस्पताल पहुंचने के लिए इन्हीं प्राइवेट एंबुलेंस की मदद लेते हैं। चालक भी ‘कमाई’ का ये मौका किसी भी सूरत-ए-हाल में गवांते नहीं हैं। मरीज से उसकी समस्या और कहां जाना है, ये पूछकर रेट तय करते हैं। एंबुलेंस चालक मरीज और तीमारदार की मजबूरी, बेबसी का फायदा उठाकर मोटा रिकाया वसूल करते हैं। इसके बाद रास्ते में तीमारदार को कई अस्पतालों में कम पैसे में बेहतर सेवाएं मिलने का झांसा देकर उन्हें अपनी बातों में फंसाते हैं, इसके बाद अपने सेटिंग वाले अस्पताल में पहुंचाकर एंबुलेंस चालक अस्पताल प्रशासन से भी अपना कमीशन ले लेते हैं। इसके बाद शुरू होता है मरीजों से इलाज के नाम पर मोटी रकम वसूल करने का बड़ा खेल।
शहर से लेकर लखनऊ तक है सेटिंग
सूत्रों की माने तो इलाज के नाम पर मरीजों से मोटी रकम ऐंठने के पैंतरे में माहिर एंबुलेंस चालकों की सेटिंग शहर के कई नामचीन अस्पतालों से लेकर लखनऊ तक है। मरीज की हैसियत का अंदाजा लगाकर चालक उसी हिसाब के अस्पतालों में ले जाते हैं। कई एंबुलेंस ऐसी हैं, जो प्राइवेट अस्पतालों से अटैच हैं। सूत्रों का कहना है कि, इन एंबुलेंस के चालक उन्हीं अस्पतालों में मरीजों को ले जाने की पूरी कोशिश करते हैं और कामयाब भी होते हैं।
केयर ऑफ टेकर में तीन एंबुलेंस हो चुकी हैं सीज
केयर ऑफ टेकर (निजी नाम) पर एंबुलेंस का पंजीयन कराकर सड़कों पर गाड़ियों को दौड़ाने के खेल का खुलासा एक साल पूर्व एआरटीओ प्रवर्तन की कार्रवाई से हो चुका है। एआरटीओ का कहना है कि जनवरी 2020 में तीन एंबुलेंस सीज की गई थीं, जो निजी व्यक्ति के नाम पर दर्ज थीं।
एक साल से नहीं ली सुध
मरीजों को ले जाने वाली एंबुलेंस किस हालत में हैं...? जिम्मेदारों ने एक साल बीत जाने के बाद भी ये जानने की जरूरत नहीं समझी। एक साल पूर्व तीन एंबुलेंस को सीज कर कार्रवाई का ढिंढोरा पीटने वाले एआरटीओ प्रवर्तन डॉ. उदित नारायण पांडेय ने इतना समय बीत जाने के बाद भी एंबुलेंस को चेक करने की सुध तक नहीं ली है। यही वजह है कि, इतनी संख्या में एंबुलेंस बिना फिटेनस दौड़ लगा रही हैं।
जिले में हैं 110 एंबुलेंस
जिले में सरकारी और गैर सरकारी 110 एंबुलेंस हैं। इनका पंजीयन एआरटीओ दफ्तर में है। आदेश आने के बाद और मेरे कार्यकाल में किसी व्यक्ति के नाम पर एंबुलेंस का पंजीयन नहीं हुआ है। जिन व्यक्तियों के नाम एंबुलेंस का पंजीकरण है, वह आदेश से आने से पहला का है। वह गैर कानूनी नहीं है। उसका पंजीकरण निरस्त भी नहीं किया जा सकता है। -प्रवीण सिंह, एआरटीओ प्रशासन
जांच कराकर होगी कार्रवाई
बिना फिटनेस के एंबुलेंस के चलने का मामला मेरी जानकारी में नहीं है। अगर ऐसा है तो इसकी जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी। 31 जनवरी 2020 या उससे पहले की जिन एंबुलेंस का फिटनेस नहीं हैं वह कार्रवाई के दायरे में हैं, लेकिन 1 फरवरी 2020 के बाद अगर फिटनेस नहीं है तो वह एंबुलेंस कार्रवाई की जद में नहीं आएंगी। सरकार ने कोरोना काल में फिटनेस नवीनीकरण की छूट दी है, जो 30 जून तक लागू रहेगी। -डॉ. उदित नारायण पांडेय, एआरटीओ प्रवर्तन