शुक्रवार को परिक्रमा कर रहा रामादल अपने आठवें पड़ाव जरिगवां से चलकर नौवें पड़ाव नैमिषारण्य पहुंचा था। जहां पर श्रद्धालुओं ने अपना डेरा जमाया और देर रात तक भजन, कीर्तन व पूजा-अर्जन की। शनिवार की भोर होते ही पहला आश्रम के डंके ने श्रद्धालुओं की नींद तोड़ी।
श्रद्धालुओं ने आदि गंगा गोमती व चक्रतीर्थ में स्नान करने के बाद मां ललिता देवी समेत नैमिषारण्य के अन्य मंदिरों में पूजा-अर्चना किया। जिसके बाद श्रद्धालुओं का रेला रामनाम जपते हुए अपने 10वें पड़ाव कोल्हुआ बरेठी के लिए कूच कर गया। बदहाल रास्तों से गुजरता हुआ रामादल पहले केदारनाथ मंदिर पहुंचा। यहां पर पूजा-अर्चना करने के बाद श्रद्धालु बदरीनाथ धाम पहुंचे।
यहां पर श्रद्धालुओं ने भगवान शिव को बेर का भोग लगाया, प्रसाद चढ़ाया और डेरा डालने का स्थान खोजा, लेकिन उन्हें डेरा डालने भर की जगह नहीं मिली। लोगों ने सोचा कि आगे चित्रकूट धाम पर उन्हें स्थान मिल जाएगा, लेकिन जब चित्रकूट धाम पहुंचे, तो वहां भी उन्हें अव्यवस्थाओं से जूझना पड़ा। रास्ते में लक्ष्मण टीला खेती व खनन में गायब थी।
चित्रकूट धाम तक फसल लहलहा रही थी। करीब का तीर्थ सूखे तालाब का रूप ले चुका था। केदारनाथ धाम से चित्रकूट धाम तक तकरीबन पांच किलोमीटर का फासला था, लेकिन श्रद्धालुओं को वहां डेरा डालने की जगह नहीं मिल सकी। श्रद्धालु बगैर डेरा डाले मिश्रिख के लिए कूच कर गए।
परिक्रमा मेला समिति के अध्यक्ष व पहला आश्रम के महंत भरतदास, बनगढ़ आश्रम के महंत संतोष दास आदि साधु-संत सदियों पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए, मिश्रिख के लिए रवाना हो गए। इन साधु, संतों व महंतों का कहना था कि आज जो ये सदियों पुरानी परंपरा टूट रही है, इसकी जिम्मेदारी यहां के प्रशासन को जा रही है। जिसने परिक्रमा के पड़ाव स्थलों को दुरुस्त कराने की जहमत नहीं उठाई। अव्यवस्था से सामना करते-करते श्रद्धालु ऊब चुके हैं, यही वजह है कि सदियों पुरानी परंपरा को तोड़कर श्रद्धालु सीधे मिश्रिख पहुंच रहे हैं।