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संदेह के घेरे में 1500 शिक्षकों के मेडिकल दस्तावेज

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सीतापुर। अंतर्जनपदीय स्थानांतरण में शिक्षकों द्वारा भारांक का लाभ लेने के लिए फर्जी दस्तावेज लगाने की आशंका है। काउंसलिंग में लगाए गए प्रपत्रों की जांच में परत-दर-परत खुलती जा रही है। कर्मचारियों का कहना है कि करीब 1500 शिक्षकों के मेडिकल प्रपत्र संदेह के घेरे में हैं। इनको अलग कर श्रेणीबद्ध किया जा रहा है। इस फर्जीवाड़े को लेकर शिक्षक पहले ही आशंका जता चुके हैं।
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वे जिलाधिकारी से शिकायत भी कर चुके हैं। जिलाधिकारी ने अभी इस मामले में जांच का निर्देश नहीं दिए है। रविवार को कर्मचारियों ने काउंसलिंग प्रपत्र की जांच की। अंतर्जनपदीय स्थानांतरण को लेकर शिक्षकों से ऑनलाइन आवेदन लिए गए थे। इसमें करीब पांच हजार शिक्षकों ने आवेदन किए थे। एक सप्ताह पहले इन शिक्षकों की ब्लॉकवार डायट पर काउंसलिंग कराई गई थी। इस काउंसलिंग में करीब 4900 शिक्षकों ने प्रतिभाग किया था।
आवेदन पत्र के साथ संलग्न प्रपत्र लगाकर काउंसलिंग में जमा किए थे। अब इन प्रपत्रों की बीएसए ने अपने स्तर से जांच शुरू कराई है। इस जांच में लगे कर्मचारियों का कहना है कि तमाम शिक्षकों ने प्रमाणपत्र फर्जी लग रहे है। पांच नंबर का भारांक बीमारी का मिल रहा है। प्राथमिकता में शामिल होने के लिए डॉक्टरों से फर्जी तरीके से प्रमाणपत्र बनवा लिए है। जबकि यह शिक्षक फिट है।
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अगर स्वास्थ्य विभाग इनका मेडिकल करा लें तो तमाम शिक्षक इस रेस से बाहर हो जाएंगे। जबकि इस ट्रांसफर में असाध्य रोग से प्रभावित शिक्षकों को लाभ मिलेगा। लेकिन किसी शिक्षक ने बुखार का प्रमाणपत्र लगाया तो किसी ने हाईपरटेंशन का। विभाग का कहना है कि यह जांच में ही रिजेक्ट हो जाएंगे। यह रोग असाध्य की श्रेणी में नहीं आते है।
ऐसे में करीब 1500 शिक्षकों ने अपनी बीमारी बताकर मेडिकल लगाए है। अब यह सब मेडिकल संदेह की श्रेणी में आ गए है। रविवार को अवकाश के कारण भी बीएसए ऑफिस खुला। पटल सहायक महिपाल, विजय रावत व अन्य कर्मचारी जांच में जुटे रहे।
पहले ही गठित होना चाहिए था मेडिकल बोर्ड
शिक्षक संगठनों का कहना है कि यह स्थानांतरण प्रक्रिया प्रदेश में चल रही है। लखीमपुर व शाहजहांपुर जिले में भी ऐसी शिकायती आई थी। वहां पर मेडिकल बोर्ड गठित हो गया है। इसी तरह सीतापुर जिले में भी मेडिकल बोर्ड गठित होना चाहिए।
इससे पूरा खेल सामने आ जाएगा। विभाग को चाहिए था कि वह काउंसलिंग के समय ही मेडिकल बोर्ड गठित कर देता तो यह फिर से प्रपत्र जांच की नौबत न आती है। इससे एक तो विलंब लगेगा, वही अगर विभाग ने सही तरीके से जांच नहीं कराई तो शिक्षक अपनी कूटरचित चाल में सफल हो जाएंगे।
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