बीहट गौड़ गांव स्थित राजकीय इंटर कॉलेज।
सीतापुर। जिले के बीहट गौड़ गांव की होली कुछ अलग व सबसे खास है। यहां होली के एक दिन बाद रंगोत्सव मनाए जाने की परंपरा है। इस गांव के लोग आज भी परंपरा निभा रहे हैं। यहां होली के अगले दिन रंग-गुलाल की धूम मचती है। इसके बाद एक-दूसरे के घर जाकर होली मिलन की रस्म निभाई जाती है। यह परंपरा पौराणिक 84 कोसी परिक्रमा से जुड़ी है।
होली का पर्व मन में उमंग व उल्लास भर देता है। होलिका दहन के अगले दिन रंगोत्सव की धूम मचती है। इसमें बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी रंग-गुलाल से सराबोर हो जाते हैं। फागुन की मस्ती हर किसी के सर चढ़कर बोलती है। होली के दिन दोपहर तक रंग खेलने इसके बाद नए कपड़े पहनकर एक-दूसरे से गले मिलकर होली मिलन की परंपरा निभाई जाती है। इससे अलग हटकर पिसावां ब्लॉक की सबसे ज्यादा आबादी वाली बीहट गौड़ ग्राम पंचायत में होली का त्योहार एक दिन बाद मनाया जाता है। बीहट गौड़ व इसके तीन मजरों में आजादी के पहले से यह परंपरा चली आ रही है। यहां होलिका दहन के तीसरे दिन त्योहार मनाया जाता है।
यहां के बुजुर्गों के मुताबिक आजादी से पहले जमींदारी के दौर में गांव के ज्यादातर लोग पौराणिक 84 कोसी परिक्रमा करने जाते थे। परिक्रमा का समापन होलिका दहन के साथ होने के कारण होली वाले दिन सभी घर वापस लौटते थे। होली के दिन थकान मिटाने के लिए आराम करते थे। इस वजह से अगले दिन होली खेलते थे। इस गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पीढि़यों से चली आ रही यह परंपरा आज भी कायम है। यहां होली का खास जलसा होता है। फाग गाने वालों की टोलियां भी निकलती हैं।
पीढियों से चली आ रही यह परंपरा पहले आसपास के दर्जनों गांवों में निभाई जाती थी। समय बदला तो कई गांवों में यह परंपरा कमजोर पड़ गई और वहां होली के दिन ही त्योहार मनााया जाने लगा। हांलाकि, बीहट गौड़ ग्राम पंचायत व इसके मजरा ककरहिया, भटपुरवा और बरुवा की लगभग 17 हजार आबादी आज भी पीढियों से चली आ रही परंपरा निभाती है।
बुजुर्गों ने साझा किया परंपरा का इतिहास
बीहट गौड़ में रहने वाले 95 साल के विजय सिंह ने बताया कि यह परंपरा उन्हें पुरखों से विरासत में मिली है। जमींदारी के दौर में आज की तरह संसाधन नहीं थे। पैदल व बैलगाड़ी ही आवागमन का मुख्य साधन होते थे। 84 कोसी परिक्रमा से होली के दिन वापसी होती थी, इसलिए अगले दिन त्योहार मनाते थे। विश्राम लाल शुक्ल बताते हैं कि यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। बीहट गौड़ गांव कई मायनों में खास है लेकिन होली का त्योहार अगले दिन मनाए जाने की परंपरा के कारण इसकी अलग पहचान है। यह हमारी अनमोल विरासत है।