फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बाढ़ ने निगले दस आशियाने

Fri, 22 Jul 2016 11:07 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
विज्ञापन
नाव के सहारे सफर करते लोग। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
रेउसा व रामपुर मथुरा क्षेत्र में आई बाढ़ को करीब एक सप्ताह का समय बीत चुका है, बावजूद इसके मुसीबत कम होने का नाम नही ले रही है। पूरे क्षेत्र में पानी का सैलाब है, घरों के अंदर घाघरा का पानी हिलोरें मार रहा है।
विज्ञापन


प्रशासन की मदद कहीं नजर नही आ रही है। लोगों के घरों में राशन या तो बाढ़ की भेंट चढ़ गया, या फिर इस एक सप्ताह में समाप्त हो चुका है। मुसीबत ये है कि लोग जान बचाने की खातिर बाढग़्रस्त क्षेत्र से बाहर भी नहीं आ पा रहे हैं। टापू पर बसा पचीसा गांव भी घाघरा की बाढ़ की चपेट मे हैं, वहां के 10 घरों को घाघरा निगल चुकी है।

पीड़ितों ने घरेलू सामान को टापू पर ही दूसरे स्थान पर रखा है। प्रशासन की सतर्कता की बात करें तो अभी तक प्रशासन को यह जानकारी ही नही है कि पचीसा टापू पर घर भी कटे हैं। प्रशासन जो सरकारी नावें चलाने के दावे कर रहा है, उन नावों के नाविक लोगों से किराया वसूल रहे हैं।
विज्ञापन


जलस्तर बढ़ने के कारण रेउसा क्षेत्र में बाढ़ग़्रस्त गांवों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। गुरुवार की रात क्षेत्र के मुजेहना व महेशपुर गांव बाढ़ की चपेट में आ गए हैं। जबकि सीपतपुर गांव चारों तरफ से बाढ़ के पानी से घिरा हुआ है। जलस्तर में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है।

हर तरफ त्राहि-त्राहि मची हुई है। घाघरा के टापू पर बसा पचीसा गांव बाढ़ की जद में है। वहीं घाघरा नदी तेजी से कटान कर रही है। गांव के रामसिंह, कलेक्टर, पैकरमा, डिप्टी, दूजी, रामकुमार, रमेश, पप्पू व संतराम आदि के घर कटकर घाघरा में समा गए हैं। हालांकि कटान को देखते हुए घरों से परिवार पहले ही निकल चुके थे।

शुक्रवार को गांव के रामसिंह कुछ अन्य लोगों के साथ एक नाव से नदी पार कर मारू बेहड़ पहुंचे। उन लोगों ने घर कटकर घाघरा में समाने की पुष्टि की है। पार आए ग्रामीणों ने बताया कि वे चार दिन बाद नदी पार करने की हिम्मत जुटा पाए। करीब दस किलोमीटर पानी को पार कर वे मारू बेहड़ पहुंचे थे। उन्होंने बताया कि उन्हें सरकारी नाव की मदद नहीं मिली, सरकारी नाव चल भी रही है, यह भी नहीं पता, क्योंकि वे 150 रुपये किराया देकर नाव से नदी पार उतरे हैं।

क्षेत्र के कोनी, निर्मल पुरवा, गोड़ियन पुरवा, रामलाल पुरवा आदि बाढग़्रस्त गांवों के लोगों का भी कहना है कि कहीं भी सरकारी नावें नही चल रही है। हो सकता है कि केवल कागजों पर ही सरकारी नाव दर्शाई जा रही हो। बाढ़ में फंसे सैकड़ों परिवारों को अभी तक राशन व तेल जैसी कोई मदद भी मुहैया नहीं कराई गई है।

घरों में रखा राशन समाप्त हो रहा है। रोशनी करने के लिए केरोसिन भी नहीं बचा है। बाढ़ के पानी में अंधेरे में ही रहना पड़ रहा है। छोटे-छोटे बच्चे भूख से बिलबिला रहे हैं। वे करीब 10 किलोमीटर पानी में चलकर मारू बेहड़ पहुंचे थे। यहां पर बाजार बंद थी, जिसकी वजह से करीब 50 लीटर दूध लेकर रेउसा बाजार आना पड़ा। यहां पर दूध बेचा है, उसके बाद अब आटा, दाल, चावल आदि सामान खरीद रहे हैं।

सामान खरीदने के बाद वापस टापू पर पहुंचने की कवायद की जाएगी। सब कुछ ठीक रहा तो गांव तक राशन व अन्य जरूरी सामान जरूर पहुंचाएंगे। ग्रामीणों ने बताया कि टापू पर जो पशु पाले हैं, गांव के लोग उन्हीं पशुओं के दूध के सहारे भूख मिटाने का प्रयास कर रहे हैं। हालत ये है कि घर के बड़े व बुजुर्ग बच्चों को दूध देकर खुद भूखे सो रहे हैं। अब जब राशन पहुुंचेगा, तब पचीसा गांव के लोगों के घर कहीं चूल्हा जल सकेगा।

रामपुर मथुरा क्षेत्र में भी हालत दिन ब दिन दयनीय होती जा रही है। इस क्षेत्र के 35 गांव बाढ़ की जद में हैं। पूरे जिले में करीब 100 गांव बाढ़ की जद में हैं। सैकड़ों बीघा फसल जलमग्र हो गई है। जमीनी हकीकत ये है कि बाढ़ की असली तस्वीर प्रशासन के पास नहीं है। यही वजह रही कि बाढ़ग़्रस्त पचीसा गांव का हाल प्रशासन को पता नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें