लोक आस्था का महापर्व डाला छठ शुक्रवार की भोर उगते सूरज को अर्घ्य देने के साथ सम्पन्न हो गया। व्रतियों ने छठ घाटों पर पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-शांति की कामना करते हुए प्रसाद ग्रहण कर व्रत खोला।
भोर से ही घाटों पर- उगा हो सूरज देव, भोर भिनसरवा, अरघ के बेरिया, पूजन के बेरिया हो..., पहिले पहिल हम कइली, छठि मइया बरत तोहार, करिहा क्षमा छठि मइया भूल-चूक हमार...,आदि गीत गूंजने लगे। छठ मइया के गीतों से घाट का माहौल भक्तिमय हो गया।
छठ महापर्व के चौथे व अंतिम दिन शुक्रवार की भोर से ही श्रद्धालुओं के घरों में चहल-पहल शुरू हो गई। पूजा की सारी तैयारियों के साथ श्रद्धालु छठ घाटों की ओर चल पड़े। सूर्योदय से पहले ही शहर की 27वीं वाहिनी पीएसी व गोल्फ ग्रांउड तालाब के अलावा ताड़कनाथ मंदिर के पास सरायन नदी घाट और पुलिस लाइन के मंदिर पर श्रद्धालु पहुंचने लगे।
सूर्यदेव ने उदय होने का आभास कराया तो छठ घाटों पर हलचल तेज हो गई। सूर्यदेव की लालिमा बढने के साथ ही इन छठ घाटों पर श्रद्धा, भक्ति व लोक परंपरा की अनुपम छटा बिखरने लगी।
भगवान भास्कर के उदय होते ही व्रती महिलाओं ने तालाब में खड़े होकर सूप, बांस की डलिया में मौसमी फल, गन्ना व पूजन सामग्री लेकर जल और दूध से उन्हें अर्घ्य दिया तथा संतान के कल्याण व परिवार के लिए सुख-संपत्ति की कामना की।
इसके बाद व्रती महिलाओं के पति व बच्चों ने तालाब में पूजन सामग्री अर्पित की। विधि-विधान से पूजन के बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रती महिलाओं ने निर्जला व्रत का पारण किया। इसी के साथ चार दिनों तक चलने वाला डालाछठ महापर्व सम्पन्न हो गया। इस दौरान छठ मइया के गीतों ने माहौल में भक्तिरस घोल दिया।