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नगर में निकला असद का जुलूस

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‘जालिमों का इस्लाम से कोई नाता नही’

महमूदाबाद (सीतापुर)। दरगाह हजरत अब्बास में बनी हासिम का प्रोग्राम पूरी अकीदत व एहतेराम के साथ मनाया गया। इस मौके पर मजलिस को खेताब करते हुए मौलाना फैज अब्बास बहराइची ने कहा कि इमाम हुसैन की कुर्बानी दुनिया की सबसे अजीम कुर्बानी है। इमाम हुसैन ने जालिम के सामने सिर झुकाना नहीं पसंद किया। इस्लाम को बचाने के लिए यजीदी फौज से हक के लिए लड़कर इंसानियत को बचाया था।

उन्होंने कहा अपने नाना मोहम्मदे मुस्तफा के दीन के परचम को बुलंद कर तीन दिन तक तपते रेगिस्तान जैसी जमीन पर भूखे-प्यासे रहकर भी अपने इमान पर डटे रहे। यजीदी फौज ने जुल्म की इंतिहा कर दी और छोटे-छोटे बच्चें को शहीद कर दिया। आज दुनिया में जो लोग इंसानों पर दहशत गर्दी कर रहे हैं, यही यजीद के आतंकी समूह के बचे हुए जालिम इंसान हैं।
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उनका इस्लाम से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। इस्लाम तो अमन का पैगाम देता है। मजलिस के बाद कैसर नवाब जौनपुरी ने बनी हासिम की सहादत पढना शुरू की और ताबूत निकलना शुरू हुए। इस मंजर को देख सोगवारे हुसैनी की आंखों से आंसू निकल पड़े। शहीदों के ताबूतों को बच्चे, नौजवान व बुजुर्ग उठाकर कंधे पर रखकर चल रहे थे। ताबूत के बाद छोटे-छोटे बच्चे बनी असद का काफिला लेकर निकले।

यह मंजर देखकर वहां मौजूद महिलाएं भी रोने लगी और अपनी नम आखों ने इमाम हुसैन को पुरसा दिया। जुलूस के पीछे 18 बच्चे हजरत अब्बास के अलम को उठाए चल रहे थे। मजलिस से पहले आमिर वारसी, सज्जाद अली ने अपने कलाम पढ़े। प्रोग्राम में मौलाना सज्जाद हुसैन, पप्पू रिजवी, हसन बाबू, आदिल, फजल अब्बास, शकील जैदी, खुर्शीद जैदी, अनवर हुसैन, शेख अनवार हुसैन, अरसद, जीमल, मो. हैदर, सब्बर रिजवी, सफदर हुसैन, आरिफ हुसैन, हैदर अब्बास, सोगवारे हुसैनी मौजूद थे।
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अंजुमन हैदरी, अंजुमन सज्जादिया, अंजुमन अब्बासिया नौहाख्वानी व सीनीजनीं करते हुए दरगाह हजरत अब्बास के रौजे के अंदर पहुंची। रौजे से या हुसैन, या अब्बास के नारों के साथ प्रोग्राम खत्म हुआ।
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