सीतापुर। रोजी-रोटी के लिए घर से दूर काम धंधा करने गए मजदूरों के हौसले कोरोना की रफ्तार देख पस्त होने लगे हैं। उनके जेहन में पिछले साल हुए लॉकडाउन की त्रासदी घूमने लगी है। उन्हें दोबारा लॉकडाउन होने का डर सताने लगा है। ऐसे में परेशानियों से बचने के लिए मजदूरों ने घर वापसी करनी शुरू कर दी है।
पिछले साल कोविड चेन तोड़ने के लिए 22 मार्च से लॉकडाउन की कवायद शुरू हुई थी। इसके बाद लंबे समय तक चार चरणों में लॉकडाउन चला था। इस दौरान बड़ी संख्या में मजदूरों ने घर वापसी की थी। इस सफर में उन्हें तमाम परेशानियां झेलनी पड़ी थीं। शुरुआती दौर में मजदूरों को साधन नहीं मिले थे। बहुतों को भूखे प्यासे पैदल यात्रा करनी पड़ी थी। मौजूदा वक्त में कोरोना की रफ्तार तेज हो गई है।
मजदूरों को एक बार संपूर्ण लॉकडाउन की शंका सताने लगी है। ऐसे मजदूरों ने घर वापसी शुरू कर दी है। रोडवेज बस अड्डे पर बस से युवाओं की टोली उतरी। पूछने पर युवाओं ने बताया कि वे महमूदाबाद के रहने वाले हैं और आगरा से वापसी कर रहे हैं। आगरा में सभी एक चिप्स फैक्ट्री में काम करते थे। टोली में शामिल आशीष ने कहा कि तेजी से बढ़ रहे कोरोना के चलते घर से लगातार फोन जा रहे थे। इस लिए वापसी करनी पड़ी।
जितेन्द्र व देवन्द्र ने कहा कि जिंदगी रहेगी तभी काम-धाम मिलेगा। जिंदगी बचाने के लिए वे घर वापस आ गए हैं। सत्यवान व शोभित ने कहा कि फैक्टरी में लॉकडाउन को लेकर चर्चाएं हो रही थीं। उनके साथी तरह-तरह की बातें कह रहे थे। कुछ कह रहे थे कि अगर हालत ऐसे ही रहे तो जल्द लॉकडाउन लग जाएग तो कुछ पिछले साल हुए लॉकडाउन में हुई परेशानियां बयां कर रहे थे। ये सब सुनकर हिम्मत टूट गई और बस पर बैठकर घर वापसी कर दी।
मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट
कोरोना के कहर से मजदूरों ने घर वापसी करनी शुरू कर दी है। घर आने पर उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। पंचायत चुनाव के चलते मनरेगा की रफ्तार भी धीमी चल रही है। इसके चलने मजदूरों को काम नहीं मिल रहा है। कोरोना की दूसरे दौर की शुरुआत में ही मछरेहटा के गांव परसदा के मनोज व कल्लू दिल्ली से घर वापस आ गए थे। अभी तक उन्हें कहीं काम नहीं मिला है। कभी गांव में ही मजदूरी करके कुछ धनार्जन कर लेते हैं।
मजदूरों के लिए खेती बनी सहारा
अभी सरकार ने घर वापसी कर रहे मजदूरों पर नजरें इनायत नहीं की हैं। ऐसे में सरकारी मशीनरी मजदूरों को तवज्जो नहीं दे रही है। लेकिन खेती- किसानी मजदूरों के लिए बड़ा सहारा बन रही है। गेहूं की कटाई- मड़ाई के साथ ही गन्ना गुड़ाई चल रही है। इन दोनों कार्यों में बड़ी संख्या में मजदूरों की जरूरत होती है। इसलिए गांव में मजदूरों को काम मिल जा रहा है। पिछले साल के लॉकडाउन में भी खेती-किसानी प्रवासी मजदूरों के लिए बड़ा सहारा बनी थी।