नैमिषारण्य (सीतापुर)। कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मार्गशीर्ष अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। इस बार मार्गशीर्ष अमावस्या पर दो दिन का संयोग बन रहा है। पहले 30 नवंबर को शनिचरी अमावस्या मनाई जाएगी। इस दिन तर्पण व पिंडदान का विशेष महत्व है। अगले दिन उदया तिथि पर स्नान दान का महत्व है।
मार्गशीर्ष अमावस्या के दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। इसके साथ ही इस दिन स्नान, दान, श्राद्ध-पिंडदान आदि कार्य किए जाते हैं। इस दिन विधि पूर्वक पूजा पाठ करने से जीवन में सुख और समृद्धि आती है। आचार्य रमेश चंद्र द्विवेदी ने बताया कि शनिवार की अमावस्या के दिन शनिदेव की पूजा का भी विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इससे शनि के बुरे प्रभाव से मुक्ति मिलती है।
कुछ लोग इस पवित्र दिन पर व्रत भी रखते हैं ताकि उनका मन और शरीर शुद्ध रहे। अमावस्या के दिन कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ भी होते हैं। शनिवार के दिन अमावस्या होने से इसका महत्व और बढ़ जाता है। इस दिन दान पुण्य करने से शनि की दशा में भी लाभ मिलता है। पितरों को प्रसन्न करने के लिए शाम के वक्त पीपल के पेड़ पर सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
आचार्य विवेक द्विवेदी ने बताया कि अमावस्या तिथि 30 नवंबर की सुबह 10:30 बजे से शुरू होगी, जो एक दिसंबर की सुबह 11:51 बजे तक रहेगी। इस लिए दो दिन मानी जाएगी। इसी वजह से लोगों के मन में संशय की स्थिति बनी हुई है। आचार्य ने बताया श्राद्ध के लिए दोपहर का समय श्रेष्ठ बताया गया है।
श्राद्ध हमेशा कुतपकाल में करना चाहिए जो दोपहर 12 बजे के आसपास होता है। मार्गशीर्ष अमावस्या तिथि का कुतप काल 30 नवंबर को रहेगा। इस हिसाब से पितरों की शांति के लिए किए जाने वाले श्राद्ध और पिंडदान के लिए यही दिन श्रेष्ठ रहेगा। स्नान-दान उदया तिथि देखकर किया जाता है। यानी जिस तिथि में सूर्योदय हो, उसी तिथि में स्नान-दान करने का महत्व है। मार्गशीर्ष मास की अमावस्या तिथि का सूर्योदय एक दिसंबर को होगा। इसलिए स्नान-दान का महत्व एक दिसंबर को है।
शनि अमावस्या पर ये करें दान
मार्गशीर्ष अमावस्या शनिवार को होने की वजह से शनि की प्रिय वस्तुओं का दान करें। काली उड़द, काले तिल एवं काली वस्तुएं दान करना लाभकारी होता है।