शहर से करीब 80 किलोमीटर दूर घाघरा नदी के दो फाटों के बीच बसे रेउसा के पचीसा गांव में भी अब ककहरा सुनाई देगा। यहां के बच्चे भी स्कूल जा सकेंगे। शिक्षा विभाग ने गांव के बच्चों को शिक्षित करने के लिए 20 अध्यापकों की एक टोली बनाई है। यह टोली नाव से रोजाना नदी पार कर गांव के बच्चों को पढ़ाने जाएगी। इसके लिए शिक्षा विभाग ने सर्वे कर लिया है। गांव की एक हजार की आबादी में करीब 100 बच्चाें को पहली बार टापू पर पढ़ाने की व्यवस्था की जा रही है।
घाघरा के किनारे कभी पचीसा गांव हुआ करता था पर बाढ़ व कटान ने गांव को काफी नुकसान पहुंचाया। परेशान लोगों ने घाघरा के बीच टापू पर बसना शुरू कर दिया। पचीसा समेत करीब के कोनी, बरार, दर्जिन पुरवा, जैतहिया, कबड़ियन पुरवा, निर्मल पुरवा, गड़रियन पुरवा, गोड़ियन पुरवा, सिसैया बाजार, नगीना पुरवा आदि नदी में आई बाढ़ से सिमटते चले गए। करीब 15 वर्ष पहले टापू पर बसने का जो सिलसिला शुरू हुआ।
उससे अच्छी खासी आबादी अब टापू पर रहने लगी है। इस टापू को पचीसा के नाम से जाना जाता है। सीतापुर-बहराइच जिले की सीमा पर बसा यह टापू घाघरा नदी से घिरा हुआ है। जरूरत का सामान लेना हो या फिर काम की तलाश में निकलना हो, लोगों को घाघरा पार करनी पड़ती है। बड़े तो नदी पार कर निकल जाते हैं पर बच्चे टापू पर धमाचौकड़ी करते हैं।
गांव में स्कूल न होने से बच्चे पढ़ नहीं पा रहे हैं। गांव के लोगों का कहना है कि कौन बच्चों की जिंदगी को खतरे में डाले और पढ़ने के लिए नदी पार भेजे। मामला संज्ञान में आने पर अब शिक्षा विभाग ने गांव के बच्चों को साक्षर बनाने की कवायद शुरू की है। करीब 15 साल बाद ऐसा मौका आया, जब बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
बीएसए संजीव सिंह व खंड शिक्षा अधिकारी उपेंद्र सिंह के नेतृत्व में बुधवार को एक टीम नाव से नदी पार टापू पर पहुंची। यहां हुए सर्वे में पता चला कि करीब 115 बच्चे हैं। इन्हें चिह्नित कर महकमे ने 20 शिक्षकों की एक टीम गठित की है। टीम में शामिल तीन शिक्षक प्रतिदिन नाव से नदी पार टापू पहुंचेंगे। उनके पहुंचने के बाद वहां स्कूल खुलेगा और बच्चों की पढ़ाई शुरू होगी।
गांव के लोगों का कहना है कि इस व्यवस्था से बच्चों को घर बैठे ही शिक्षा मिलेगी और जान का खतरा भी नहीं होगा। गांव के रामरूप, रामस्वरूप, छोटकन्ने, राजाराम, बहोरी लाल, लाला, राजू, कल्लू, पप्पू आदि का कहना है कि पचीसा गांव के लिए यह ऐतिहासिक पल है। ऐसा पहली बार हो रहा है, जब इस टापू पर बसे परिवारों के बच्चों को पढ़ने का मौका मिलेगा।