घाघरा नदी के कटान ने इस कदर तटीय क्षेत्र की आबादी में दहशत पैदा कर दी है कि लोग खुद ही अपने आशियानों को मिटाने पर तुले हुए हैं। ग्रामीण इस लालच में हैं कि जो कुछ भी बच जाए, उसे नदी में बहने से बचा लिया जाए। यही वजह है कि वे हाथों में घन व बेलचा लेकर अपने घरों को ढहा रहे हैं।
गांजरी क्षेत्र के ग्राम गोडिय़न पुरवा गांव घाघरा नदी के तट पर बसा हुआ है। रविवार को इसी गांव के निवासी सोहन लाल का परिवार अपना घर अपने हाथों तोड़ रहा था। कोई हाथ में घन लेकर छत पर धड़ाम-धड़ाम प्रहार कर रहा था, तो कोरई बेलचा लेकर दीवार से ईंट निकाल रहा था।
छत की एक- एक ईंट धीरे-धीरे टूटकर जमीन पर गिर रही थी, वहीं छत में पड़ी लोहे की सरिया बाहर निकल रही थी। परिवार के सदस्य एक-एक ईंट को उठाकर अलग रख रहे थे। बताने लगे कि घर कटकर नदी में बह जाने से अच्छा है कि घर में लगी ईँट व सरिया को ही बचा लिया जाए।
यह सामग्री किसी अन्य स्थान पर आशियाना बनाने में काम आएगी। वहीं सोहन लाल की बूढ़ी मां आंसू बहा रही थी। उन्होंने बताया कि 20 वर्ष पूर्व उनके पति तुलसीराम ने कर्ज लेकर इस घर को बनाया था, तब यह नदी गांव से तकरीबन दस किलोमीटर दूर थी।
आहिस्ता-आहिस्ता ऐसा समय बीता कि आज नदी उनके घर को बहाकर ले जाने के लिए बेताब है। इसी तरह गांव के रामदयाल का परिवार भी अपना पक्का मकान तोड़ रहा था। गांव के बांकेलाल व अन्य ग्रामीण अपने घरों का सामान समेट चुके थे।
वे सभी वाहन के इंतजाम में व्यस्त थे, ताकि घरेलू सामान को वाहन पर लादकर कहीं सुरक्षित स्थान पर पहुंचा जा सके। बांके लाल व राम दयाल ने बताया कि एक समय था, जब यहां उनका जन्म हुआ, इस घर के आंगन में उन्होंने उछल -ूद मचाई, खेले और बड़े हुए, आज उनके बचपन का आशियाना व आंगन उनके सामने ही बर्बाद होकर नदी में समाता नजर आ रहा है।
गांव के राजाराम ने घरेलू सामान एक वाहन में लोड कर लिया था। उसी दौरान उनकी पुत्री शिल्पी वाहन से कूदकर घर की तरफ दौड़ी जा रही थी, वह चिल्ला रही थी कि उसकी गुड़िय़ा घर में ही रह गई है। जब घर जाकर देखा तो महज मिट्टी की दीवारें ही खड़ी थी, इन्ही दीवारों के बीच एक प्लास्टिक की गुड़िया पड़ी थी। जिसको शिल्पी ने दौड़कर उठाया और वापस परिवार के पास चली गई।
इसी तरह से निर्मल पुरवा, जैतहिया, ठकुरन पुरवा, ठेकेदार पुरवा आदि के दर्जनों ग्रामीण अपने आशियानों को उजाड़कर सुरक्षित ठिकानों की तलाश में जा रहे थे।