सीतापुर। चित्रकूट जेल में दो बंदियों की हत्या के बाद पुलिस की जवाबी कार्रवाई में मारे गए शातिर अपराधी अंशू दीक्षित ने महज 13 साल की उम्र में हत्या कर अपराध की दुनिया में कदम रखा था। इस घटना के बाद उसने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। एक के बाद एक वह अपराध करता चला गया। मारपीट, फायरिंग व हत्या कर अपने नाम की दहशत पैदा करना उसका शौक बन चुका था।
मूलरूप से सीतापुर के मानपुर इलाके का रहने वाला अंशू दीक्षित अपराध की दुनिया का बड़ा नाम बन चुका था। सीतापुर ही नहीं यूपी के कई जिलों, पूर्वांचल, बिहार, मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों और जिलों में उसके नाम की दहशत थी। बीते शुक्रवार को चित्रकूट जेल में हुए गैंगवार के बाद बंदियों को मौत के घाट उतारने वाले अंशू को भी पुलिस ने मार गिराया।
इसके बाद भले ही उसके आतंक का अंत हो गया हो, लेकिन अंशू कितना बड़ा अपराधी था, इसकी अहम जानकारियां उसकी आपराधिक कुंडली खंगालने पर सामने आने के बाद सीतापुर पुलिस भी हैरान है। सीतापुर की पुलिस इस मामले में बहुत कुछ नहीं बोल रही है, लेकिन पुलिस के भरोसेमंद सूत्रों और पुराने जानकारों के हवाले से जो जानकारी मिली है, वह हैरान करने वाली है।
अंशू के अंत के बाद अब हर कोई उसके अतीत के बारे में जानने को उत्सुक है। इसकी वजह भी है। जेल के अंदर मॉफिया डॉन मुख्तार अंसारी के करीबियों को मौत की नींद सुलाने का बड़ा काम कोई आम अपराधी नहीं कर सकता। दो दशक पहले यानी 2000 के उस दौर में, जब अपराध करना और गुंडा, माफिया बनना अपराधी शान समझते थे, अपराध के पन्ने पलटे तो अंशू का अतीत भी कुछ इसी पर आधारित है।
उस दौर में वह भी अपराध से नाम कमाना शौक समझता था। जानकार बताते हैं कि इसलिए वह बचपन से ही मोहल्ले में मारपीट, लड़ाई झगड़ा करने लगा था। अंशू शहर के उजागर लाल इंटर कॉलेज का छात्र था। उस दौर में कॉलेज में क्रिकेेट का बड़ा क्रेज था। छुट्टी होने के बाद जीआईसी के ग्राउंड पर अंशू और उसके साथी क्रिकेट खेलने जाते थे। दूसरे गुटों के छात्र भी आते थे, जहां पर अक्सर अपना जलवा दिखाने के लिए छात्रों के बीच विवाद होता था और यही विवाद बाद में फायरिंग तक पहुंच जाते थे।
अक्सर जीआईसी ग्राउंड पर नदी के दोनों ओर से अंशू और दूसरे छात्रों के बीच गोलियां तड़तड़ाती थी। यह बात साल 1999 के करीब की है। 1987 में अंशू का जन्म हुआ था। 1999 में उसकी उम्र करीब 12 साल थी। इस छोटी सी उम्र में ही वह बड़ों-बड़ों पर भारी पड़ने लगा था। अंशू पढ़ाई कर ही रहा था, इसी बीच उसके बेखौफी के किस्से आम हो चुके थे। इसी का फायदा उठाकर 2000 में रोटीगोदाम के एक शख्स ने अंशू का सहारा लिया। एक फर्जी नोटों के मामले में हुए विवाद के बाद एक व्यक्ति को रास्ते से हटाने के लिए अंशू को चुना गया।
अंशू के राजी होने के बाद उसे टास्क मिला। अपराध करने का जुनून अंशू के सिर पर एक तरह से सवार हो चुका था। यही वजह थी कि अंशू सभासद के साथ सीतापुर और खैैराबाद के बीच स्थित एक ढाबे पर पहुुंचा, जहां पर जानकार बताते हैं कि खाने-पीने का दौर खत्म होने के बाद ढाबे के पास ही अंशू ने टास्क को पूरा करते हुए व्यक्ति की हत्या कर अपने जीवन में पहली बार किसी की जान लेने का दुस्साहस किया था।
जानकारों की माने तो इस मामले में अंशू पर केस नहीं हुआ था। वह इस मामले से बरी हो गया था। हत्या कराने वाले ने ही गुनाह अपने सिर ले लिया था। छोटे-छोटे विवाद करने वाला अंशू बस यहीं से चर्चा में आया। पुलिस कार्रवाई न होने, हत्या के बाद भी बच निकलने से अंशू और बेखौफ हो गया।
रोटी गोदाम ने ओढ़ ली खामोशी की चादर
चित्रकूट जेल में अपराधी अंशू दीक्षित को मारे जाने की खबर जिले में आते ही चर्चाओं का दौर पूरे दिन जारी रहा। ऐसे में जिस रोटी गोदाम मोहल्ले में अंशू लंबे समय तक रहा था, वहां भी लोग दबी जुबान से चर्चाएं कर रहे थे, लेकिन यहां का कोई भी शख्स खुलकर बोलने को तैयार नहीं था। एक तरह से ऐसा लग रहा था कि पूरे मोहल्ले ने खामोशी की चादर ओढ़ ली है।
दोपहर बाद अमर उजाला की टीम मोहल्ले में पहुंची। टीम ने मोहल्ले में करीब एक घंटे समय गुजारा। यहां के कुछ लोगों से टीम ने अंशू दीक्षित के अतीत के बारे में बात करने की कोशिश की तो किसी का मुंह नहीं खुला। सभी गोलमोल जवाब देकर मामले से बचते नजर आए। ऐसे में आसानी से समझा जा सकता है कि अंशू का खौफ मोहल्ले में अब भी कायम है।
घर बेच शहर आ गए थे अंशू के पिता
अंशू के पिता जगदीश दीक्षित मूलरूप से मानपुर के कोड़रा गांव के रहने वाले बताए जा रहे हैं। जानकारों का कहना है कि करीब 60-65 साल पहले जगदीश घर बेचकर शहर आ गए थे। यहां पर वह परचून की दुकान करते थे। अंशू की दादी आंख अस्पताल में बतौर नर्स कार्य करती थी। यहीं पर मिले सरकारी आवास में अंशू की दादी अपने दोनों पुत्रों, बहुुओं समेत पूरे परिवार के साथ रहती थीं। रिटायर होने के बाद आवास खाली कर दिया था।
दो बहन और दो भाई थे अंशू
अंशू दीक्षित की दो बहनें हैं। दोनों की शादी हो चुकी है। अंशू का एक भाई अन्नू दीक्षित है। पुलिस की माने तो अन्नू ने प्रेम विवाह की थी। विवाह के बाद से वह परिवार से दूर चला गया था। इसके बाद वापस नहीं आया है। अंशू के माता-पिता शहर के शास्त्रीनगर मोहल्ले में रहते हैं। पुलिस का कहना है कि अन्नू अब कहां है, इस बारे में परिवार के लोगों को कोई जानकारी नहीं है। वह संपर्क में नहीं है।
शहर कोतवाली में खुली थी हिस्ट्रीशीट
अंशू और उसका भाई अन्नू भी शातिर अपराधी है। दोनों के खिलाफ सीतापुर की शहर कोतवाली में हिस्ट्रीशीट 2009 में खुली थी। अंशू के खिलाफ शहर कोतवाली में धारा 386 (रंगदारी मांगने) के दो मामले, एक मामला जीआरपी सीतापुर में पुलिस अभिरक्षा से 2013 में भागने का दर्ज है। लखनऊ के मड़ियांव, महानगर थाने में हत्या के दो मामले दर्ज हैं।
सीओ सिटी पीयूष कुमार सिंह ने बताया कि इन्हीं मुकदमों के आधार पर 2009 में अंशू की हिस्ट्रीशीट खोली गई थी। इसी के आसपास उसके भाई अन्नू पर भी दर्ज कई आपराधिक केसों के आधार पर हिस्ट्रीशीट खोली गई थी। सीओ बताते हैं कि अपराधी अपराध कहीं भी करे, लेकिन उसकी हिस्ट्रीशीट उसी के जिले के संबंधित थाने में खोली जाती है, जहां का वह निवासी होता है।