सीतापुर। गुरुवार की दोपहर रेउसा भगत सिकरोहर मार्ग पर कई बच्चे खेल रहे थे। किसी के तन पर नेकर थी तो किसी के बदन पर कच्छी व बनियान। इन्हीं बच्चों में शामिल एक बच्चे को जब बुलाया तो वह अपनी पेंट को कमर पर खिसकाते हुए करीब आया। बच्चे ने अपना नाम रामू बताया, बच्चे से बात हो ही रही थी, तभी उसकी मां रामा देवी दौड़ती हुई वहां पहुंची। मां का पहला सवाल था, का पूछत हौ हमिरे लरिका से। इसी बीच सड़क पर पड़ी झोपड़ियों से करीब आधा सैकड़ा बच्चे व महिलाएं एकत्र हो गईं। सभी सवालिया नजरों से वहां पहुंचे रिपोर्टर को देख रहे थे।
रामू की मां रामा देवी ने बताया कि उनके पति बैजू के पास कुछ समय पहले 10 बीघा खेत था। उसके खेत में भी फसलें लहलहातीं थीं। इन्हीं फसलों के दम पर परिवार का भरण-पोषण होता था और त्योहार भी बेहतर होते थे। रामादेवी के अनुसार बैजू मेड़ई पुरवा का निवासी है। हाल ही में ऐसी बाढ़ आई कि 10 बीघा खेत व घर कटकर घाघरा नदी में समा गया। बैजू, पत्नी व सात बच्चों को लेकर सिकरोहर के निकट सड़क पर आ गया। इस क्षेत्र में काम न मिलने की वजह से बैजू मजदूरी करने लखनऊ गया है। धनाभाव के चलते इनकी दीवाली फीकी रही।
इसी मार्ग पर रह रहे भगौती प्रसाद के परिवार की हालत भी बैजू के परिवार से जुदा न थी। बैजू की पत्नी कौशल्या देवी ने बताया कि उसका घर भी मेढ़ई पुरवा में ही था। भगौती के पास भी 10 बीघा जमीन व घर था। उनका खेत व घर भी घाघरा नदी की बाढ़ में चला गया। राधे की पत्नी राधिका देवी बताने लगीं कि उनका मेंड़ई पुरवा स्थित 8 बीघा खेत व घर नदी में समा गया है। क्षेत्र में कहीं इतना काम नहीं मिल रहा है, जिससे परिवार का खर्च गृहस्वामी उठा सके।
भगत सिकरोहर मार्ग पर करीब 25 परिवार ऐसे हैं, जो बाढ़ व कटान का दंश झेलने के बाद सड़क पर ही शरण लिए हुए हैं। इनके घर दिवाली पर अंधेरा ही छाया रहा। तंबौर क्षेत्र के ग्राम रजनापुर मार्ग पर 150 परिवार झोपड़ी डालकर रह रहे हैं। 70 वर्षीया राम प्यारी ने बताया कि वे बोधवा गांव की रहने वाली हैं। दो वर्ष पूर्व आई बाढ़ में घर व खेत बर्बाद गया। तब से उस गांव के लोग रजनापुर मार्ग पर झोपड़ी डालकर रह रहे हैं।
इस क्षेत्र में भी मजदूरी का टोटा है, यही वजह है कि उनका पुत्र द्वारिका मां, पत्नी व बच्चों का खर्च उठाने के लिए गैर जनपद में मजदूरी करने को मजबूर है। करीब ही झोपड़ी डालकर रह रही तारा देवी ने धोती के कोने से आंखों में भर आए आंसूओं को छिपाते हुए बोली, काहे के दीपक, काहे की मिठाई और काहे के पटाखे..। इसके बाद वह कुछ भी नहीं बोल सकी