महमूदाबाद (सीतापुर)। भारतीय प्राचीन धर्म ग्रंथ महिलाओं के सम्मान से भरे पड़े हैं। हिंदूू धर्म में देवियों को जितना अधिक महत्व मिला है, उतना देवताओं को नहीं। शायद इसी कारण से राधाकृष्ण, सीताराम जिनमें देवियों का नाम देवों से पहले लिया जाता है। यह बातें पंडित उमाशंकर पाठक ने शेखपुर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के दौरान प्रवचन में कहीं।
उन्होंने रुक्मणि हरण कथा का प्रसंग सुनाया। बताया कि महाभारत काल में विदर्भ देश के राजा भीष्मक थे। राजा के चार पुत्र रुक्मवीर, रुक्ममाली, रुक्मकेश, रुक्मबाहु तथा रुक्मणि नाम की एक बेटी थी। रुक्मणि के युवा होने पर उसके पिता भीष्मक को उसके विवाह की चिंता हुई और योग्य वर की तलाश शुरू की। पर काफी तलाश के बाद भी रुक्मणि के योग्य वर नहीं मिला।
रुक्मणि के वर की तलाश जारी थी। इसी बीच उनके बड़े बेटे रुक्मवीर ने चंदेली के राजा शिशुपाल के साथ बहन रुक्मणि का विवाह करने की सलाह देते हुए रुक्मणि व उसके पिता की इच्छा के विरुद्ध शिशुपाल के यहां टीका भेज दिया। रुक्मणि व उसके पिता बेटे के द्वारा चंदेली टीका भेजे जाने से काफी दुखी थे।
रुक्मणि के दुख व भाई द्वारा जबरन बेमेल विवाह कराए जाने की जानकारी पाकर भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मणि का हरण कर लिया। जिससे भीष्मक व रुक्मणि को प्रसन्नता प्राप्त हुई। भगवान कृष्ण ने द्वारिका आकर रुक्मणि से विधिविधान पूर्वक विवाह रचाया और रुक्मणि को अर्धांगिनी का स्थान दिया। इस मौके पर आयोजक ओमप्रकाश वर्मा, देव सरन वर्मा, जय करन, कमल वर्मा, राम सिंह गुप्ता, अमर सिंह, शिव शंकर, राम प्रकाश, रवींद्र वर्मा आदि मौजूद रहे।