कांग्रेस ने 25 साल का वनवास खत्म करने को खेला मुस्लिम कार्ड
सीतापुर। कांग्रेस ने सीतापुर संसदीय सीट पर 25 साल का वनवास खत्म करने के मकसद से अबकी मुस्लिम कार्ड खेलते हुए कैसरजहां पर भरोसा जताया है। जीत की जमीन मजबूत करने के लिए कांग्रेस हाईकमान ने जातीय समीकरणों और बीते दो लोकसभा चुनावों के नतीजों को आधार बनाया है।
यहां आजादी के बाद से अब तक हुए लोकसभा चुनावों में सबसे अधिक सात मर्तबा कांग्रेसियों ने ही परचम फहराया है। मगर 1989 के बाद से यहां की जनता ने हाथ का साथ छोड़ रखा है।
सीतापुर संसदीय क्षेत्र को अपने पहले सांसद 1951 में कांग्रेस के परागीलाल और उमा नेहरू (संयुक्त रूप में) मिले थे। 1957 और 1960 में भी इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा।
इसके बाद 1962 में जनसंघ के सूरज प्रसाद और 1967 में भारतीय जनसंघ के शारदानंद दीक्षित यहां के सांसद रहे। 1971 में जगदीश चंद्र दीक्षित ने विजय पताका फहराते हुए फिर ये सीट कांग्रेस की झोली में डाल दी।
इसके बाद 1977 में जगदीश चंद्र दीक्षित बीएलडी के हरगोविंद वर्मा से हार गए। 1980 में राजेंद्र कुमारी वाजपेयी ने ये सीट एक बार फिर कांग्रेस को वापस दिलाई।
इसके बाद 1985 और 1989 में राजेंद्र कुमारी वाजपेयी ने लगातार जीत दर्ज करते हुए सीट पर कब्जा बरकरार रखने के साथ ही सीतापुर लोकसभा क्षेत्र के इतिहास में पहली बार हैट्रिक बनाने का गौरव भी कांग्रेस के खाते में दर्ज कराया।
मगर इस हैट्रिक के बाद सीतापुर के मतदाताओं ने हाथ का साथ ऐसा छोड़ा कि फिर कांग्रेस यहां वापसी करने का रास्ता आज तक तलाश रही है। पूर्व सांसद कैसरजहां के रूप में कांग्रेस को इस बार वापसी की राह नजर आई है।
लिहाजा, कांग्रेस ने कैसरजहां को सीतापुर से अपना उम्मीदवार घोषित किया है। कैसरजहां बसपा के सिंबल पर 2009 में सीतापुर से चुनाव जीत चुकी हैं। 2014 में भी बसपा प्रत्याशी के तौर पर इन्होंने भाजपा के राजेश वर्मा को कड़ी टक्कर देते हुए तीन लाख 66 हजार 519 मत पाकर द्वितीय स्थान हासिल किया था।
इस प्रदर्शन के अलावा यहां मुस्लिम बिरादरी के 21 फीसदी वोटों का हवाला देते हुए राजनीतिक विश्लेषक जातीय समीकरणों के नजरिए से कांग्रेस के लिए कैसरजहां को तुरुप का इक्का करार दे रहे हैं।
एक तर्क ये भी है कि पार्टी के परंपरागत वोट बैंक के साथ ही गठबंधन से नाराज सपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंधमारी का फायदा भी कांग्रेस को मिल सकता है।
कैसरजहां को प्रत्याशी बनाए जाने से कांग्रेसी खेमा भी बेहद उत्साहित है। हालांकि कांग्रेस के भरोसे पर कैसरजहां कितना खरा उतरती हैं, ये तो 23 मई को चुनाव परिणाम आने पर ही पता चल सकेगा।