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बहरे बने रहे हाकिम व हुक्मरान तो ग्रामीणों ने श्रमदान से बना दिया बांस-बल्ली का अस्थाई पुल

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सरायन नदी के बगुलापारा घाट पर 20 दिन की कड़ी मेहनत और 45 हजार के खर्च में तैयार हुआ पुल
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सिधौली (सीतापुर)। माननीयों और हुक्मरानों से एक अदद पुल की मांग करते-करते थक चुके बगुलापारा के बाशिंदों ने ‘अपना हाथ, जगन्नाथ’ वाली कहावत पर अमल करते हुए खुद एक अस्थाई पुल बनाने का फैसला कर लिया। किसी ने चंदा देने तो किसी ने श्रमदान करने की हामी भरी और इस तरह कड़ी से कड़ी जुड़ती चली गई।

चंदे से जमा रकम से बांस-बल्ली व लोहे के तार इत्यादि खरीदकर ग्रामीणों ने सरायन नदी के बगुलापारा घाट पर अस्थाई पुल बनाने का काम शुरू कर दिया। पहले दिन से ही ग्रामीणों का जज्बा आकार लेने लगा। हाकिम और हुक्मरान सोते रहे और बांस-बल्ली का पुल बनकर तैयार हो गया।
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पुल बनने से ब्लॉक सिधौली व गोंदलामऊ के सैकड़ों गांवों के ग्रामीणों का आवागमन सुलभ हो गया। अब उन्हें नदी पार करने के लिए 16 किलोमीटर का चक्कर नहीं लगाना होगा। ग्रामीण इस बात से खुश हैं कि खेतीबाड़ी का काम हो अथवा बच्चों के स्कूल जाने की टेंशन, उन्होंने सभी समस्याओं का खुद ही निदान कर लिया है।

सिधौली तहसील क्षेत्र में मोहदीपुर-मुरहाडीह संपर्क मार्ग के करीब सरायन नदी पर बगुलापारा घाट है। यहां के ग्रामीणों को तहसील मुख्यालय सिधौली आने के लिए नदी पार करनी पड़ती है। कई ग्रामीणों के खेत नदी के दूसरी ओर होने और बच्चों को स्कूल जाने में दिक्कतें उठानी पड़ती थीं।

अगर नाव मिल गई तो ठीक वरना कोनीघाट या बालजती घाट तक 16 किमी. की दौड़ लगाना मजबूरी थी। बगुलापारा घाट पर पुल बनाने की मांग तो आजादी के बाद से चली आ रही है। माननीयों और अफसरों से कई मर्तबा ग्रामीणों ने लिखित में देकर पुल बनवाने की मांग उठाई।

चुनाव के समय तो नेताओं को यह समस्या नजर आने लगती मगर बाद में वे इस ओर ध्यान देने की जहमत उठाना मुनासिब नहीं समझते। गुहार लगाकर थक चुके यहां के ग्रामीणों ने अपनी मुसीबत का हल खुद ही निकालने की ठानी। बगुलापारा के रामसिंह ने पहल करते हुए श्रमदान से अस्थाई पुल बनाए जाने का प्रस्ताव रखा।

प्रस्ताव सबको पसंद आ गया। खर्च की बात आई तो चंदे का सुझाव रखा गया। बगुलापारा, मोहद्दीपुर, भीखपुर व जानकीपुर गांव में चंदा जमा किया गया। इसके बाद श्रमदान से सरायन नदी के बगुलापारा घाट पर बांस-बल्ली के अस्थाई पुल का निर्माण शुरू कर दिया गया। करीब 20 दिन की कड़ी मेहनत व 45 हजार रुपये के खर्च पर पुल बनकर तैयार हो गया।

पुल बनने से बगुलापारा, भीखपुर, जानकीपुर, मोहदीपुर सहबाजपुर, लछिमनपुर, ध्रोराह, भगवानपुर, रामपुर, कुर्सी, मोतीपुरवा, बखुरी, सिमौरी, सीतापुरवा, मडौली, गौरिया सहित करीब डेढ़ सौ गांवों की एक लाख आबादी का आवागमन बेहद सुगम हो गया है। ग्रामीण उत्साहित हैं कि पुल बनाकर उन्होंने एक बड़ी समस्या का न सिर्फ समाधान कर लिया बल्कि जिम्मेदारों को आइना दिखाने का काम किया है।

इन्होंने दिया चंदा किया श्रमदान
राम सिंह, महेश, सजीवन, हरीराम, भानप्रताप, पहलान, जयद्रथ सिंह, राकेश, देशराम, पप्पू, शुभकरन, पहलवान, जगदीश, परशुराम, जगन्नाथ, कैलाश, हीरालाल आदि।

क्या कहते हैं ग्रामीण
पुल बनाए जाने की पहल करने वाले राम सिंह कहते हैं किसी भी क्षेत्र के विकास का पहिया घूमना वहां के आवागमन का ढांचागत संसाधन तय करता है। पुल सरीखी सुविधा क्षेत्र के तरक्की की जीवनरेखा होती है। अस्थाई पुल हमने बना लिया है।

मगर यहां के बाशिंदों की समस्याओं को देखते हुए सरकार को स्थाई पुल बनाना चाहिए। जयदत्त इस अस्थाई पुल को ग्रामीणों के लिए वरदान मानते हैं। राकेश का मानना है कि पुल अस्थाई सही इससे तरक्की की ओर कुछ कदम तो बढ़ सकेंगे।

संतराम व भानु कुमार पुल बनने से खुश हैं। कहते हैं कि बगुलापारा घाट पर स्थाई पुल नहीं होने से क्षेत्र का विकास ठप है। नेताओं और अफसरों को इस आवश्यकता की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
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बगुलापारा घाट पर पुल की मांग के संबंध में जानकारी नहीं है। वहां ग्रामीणों ने अस्थाई पुल बनाया है, इस बारे में भी पता नहीं है। मेरे स्तर से जो हो सकेगा करूंगा।
-एआर फारूखी, एसडीएम सिधौली
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