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बेटियों की शादी में अवश्य दें एक ग्रंथ

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महमूदाबाद (सीतापुर)। जैन धर्म में त्याग और तप का विशेष महत्व है। जैन धर्म के मुनि और आर्यिकाएं आज भी सर्व समाज को त्याग और अहिंसा के पथ पर चलने के लिये प्रेरित करते हैं। जैन समाज के लोगों को मुनियों की बातों को ध्यान से सुनकर उसे अपने आचरण में लाना चाहिए। आज जैन समाज को एकजुट होने की बेहद जरूरत है। यह बात जम्बूद्वीप के पीठाधीश्वर स्वस्ति रवींद्र कीर्ति स्वामी ने प्रवचन देते हुए कही।
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दिगम्बर जैन मंदिर में नवनिर्मित आर्यिका रत्नमती कीर्ति स्तम्भ के अनावरण अवसर पर उन्होंने कहा कि वर्तमान में जैन धर्म की सर्वोच्च साध्वी भारत गौरव गणिनी आर्यिका ज्ञानमती माता जी की मां मोहिनी देवी (आर्यिका रत्नमती) का जन्म महमूदाबाद में हुआ था। जबमोहिनी देवी का विवाह हो रहा था तब उनके पिता ने उन्हें धर्मग्रंथ भेंट में दिया था। अपने ससुराल में रहते हुए मोहिनी ने पूरे ग्रंथ का अध्ययन किया । इसी बीच उन्होंने मैना देवी (माता ज्ञानमती) को जन्म दिया। मात्र 13 वर्ष की आयु में मैना ने त्याग और तप का निर्णय लिया और घर छोड़कर आर्यिका दीक्षा ली। आज ज्ञानमती माता को सर्वोच्च साध्वी का गौरव प्राप्त है। उन्होंने चार सौ से ज्यादा ग्रंथों को लिखा है। उन्होंने कहा कि आज बेटी के विवाह में माता-पिता लाखों रुपयों के तोहफे देते हैं।

आज समाज के लोगों को संकल्प लेना चाहिए कि बेटी को कम से कम एक धर्मग्रंथ अवश्य उपहार में दें जिससे आने वाली पीढ़ी धर्म से जुड़ सके। इस मौके पर स्वामी रवीन्द्र कीर्ति ने पूजन अर्चन कर रत्नमती कीर्ति स्तंभ का अनावरण किया। इससे पूर्व ज्ञानज्योति शिक्षण शिविर का आयोजन हुआ। इसमें उपस्थित लोगों को जैन भूगोल के बारे में बताया गया। संचालन महामंत्री पारस जैन ने किया। इस अवसर पर जैन समाज अध्यक्ष मनोरंजन जैन, राहुल जैन, विकास जैन, कोमल जैन, योगेश जैन, आदि मौजूद रहे।
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