जनाब यहां पर कहने को महिला थाना है, मगर पांच वर्ष बाद भी अभी तक थाने को महिला थानाध्यक्ष की दरकार है। यहां की कुर्सी के पुरुष प्रभारी हैं, इससे थाने पर आने वाली महिला फरियादियों को अपनी बात रखने में भी परेशानी हो रही है। इसके साथ ही सप्ताह में एक बार नई किरण के माध्यम से महिला जनसुनवाई कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। इसमें भी पैनल में पुरुषों की संख्या होने की वजह से महिलाएं अपनी बात को रखने में हिचकिचाती हैं, जिससे इनके समस्याओं का सही समाधान नहीं हो पा रहा है।
महिला हिंसा पर अंकुश लगाने के लिए सरकार नित नए प्रावधान कर रही है। कड़े कानून बनाए जा रहे हैं। सरकार के सारे दावे यहां फेल होते नजर आ रहे हैं। महिला थाना बने पांच वर्ष बीत गए, मगर अभी तक थाने को महिला प्रभारी की इंतजार है। अभी तक थाने पर पुरुष प्रभारी विराजमान हैं। इससे थाने पर आने वाली महिलाएं अपनी पीड़ा बयां नहीं कर पा रही। थाने पर अपनी पीड़ा को लेकर आने वाली महिलाओं का कहना है कि यहां कहने के लिए थाने पर दो महिला एसआई व कई कांस्टेबल तैनात हैं, लेकिन वह मामले को टरकाने का काम करती हैं। महिला थानाध्यक्ष न होने के कारण अपनी पीड़ा को बयां नहीं कर पातेे हैं, जिससे समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है।
वहीं, रविवार को नई किरण महिला जनसुनवाई कार्यक्रम में आने वाली पीड़ितों का कहना है कि थाने में पुरुष थानाध्यक्ष होने के कारण समस्याओं का सही निस्तारण नहीं हो पाता है। पुरुष पैनल होने के कारण अपनी बातों को रखने में परेशानी होती है। किसी विषम परिस्थिति से पीड़ित महिला की पुरुष थाना प्रभारी कैसे बयान लेगा और कैसे उसके साथ न्याय होगा। इस संबंध में एएसपी मंशाराम गौतम का कहना था कि दो महिला एसआई को संबद्ध किया गया है, लेकिन अप्रशिक्षित होने के कारण उन्हें थानाध्यक्ष का प्रभार नहीं दिया जा रहा। जल्द ही समस्या का समाधान कर दिया जाएगा।